पर्वत फाड़कर प्रकट हुईं मां आशापुरा, आसलपुर धाम में नवरात्रि अष्टमी पर गूंजा जयकारों का स्वर
जयपुर – चैत्र नवरात्रि की अष्टमी के अवसर पर जयपुर जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित आसलपुर गांव में विराजमान मां आशापुरा के दरबार में श्रद्धालुओं जनसैलाब उमड़ता है। सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें पहाड़ी पर स्थित गुफा मंदिर तक पहुंचने के लिए नजर आने लगती है।

आसलपुर स्थित यह प्राचीन धाम अपनी अनोखी मान्यता के लिए प्रसिद्ध है। यहां पहाड़ी की गुफा में विराजमान मां आशापुरा के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को 500 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। नवरात्रि के पावन अवसर पर दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु “जय माता दी” के जयकारों के साथ भक्ति में लीन नजर आते हैं।

मान्यता है कि विक्रम संवत 699 में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन मां आशापुरा इसी स्थल पर पर्वत को चीरकर प्रकट हुई थीं। पुजारी मोहित शर्मा के अनुसार, देवी ने सबसे पहले सांभर के राजा माणकराव को दर्शन दिए थे और यहीं मंदिर निर्माण का आदेश दिया था। तभी से हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को यहां भव्य प्रागट्योत्सव मनाया जाता है।
समिति संरक्षक महावीर सिंह राव ने बताया कि यह स्थल राजस्थान में मां आशापुरा का प्रथम प्रकट्य स्थल माना जाता है। चौहान वंश सहित कई समाजों—मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार, सोनी, मौसूण, राव, जाट, गुर्जर माली, और भी कई जातियों की कुलदेवी के रूप में यहां माता की विशेष आस्था है। मंदिर में मां के सात्विक स्वरूप की पूजा की जाती है, जहां मिष्ठान, चावल और लापसी, नारियल का भोग लगाया जाता है।

नवरात्रि के दौरान मंदिर सेवा समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। समिति अध्यक्ष शिवरतन सोनी के अनुसार, भक्तों के ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था के साथ व्रतधारियों के लिए फलाहार की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है। आसलपुर गांव का नाम भी मां आशापुरा की आस्था से जुड़ा हुआ माना जाता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, देवी के इसी पावन स्थल पर प्रकट होने के कारण इस गांव की स्थापना हुई और इसका नाम “आशापुरा” से ही प्रेरित होकर “आसलपुर” पड़ा। आज भी यह धाम श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहां हर नवरात्रि और विशेष पर्वों पर हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं और माता के दरबार से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
