अमेरिका-Israel और ईरान के बीच चल रहा तनाव धीरे-धीरे गंभीर रूप लेता जा रहा है। इस टकराव का असर भारत समेत पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। लेकिन आज हम जिस विषय की बात कर रहे हैं, वह इस युद्ध से जुड़ा होने के बावजूद थोड़ा अलग है।
हम बात कर रहे हैं फारस की खाड़ी के नीले पानी के बीच बसे एक छोटे से कोरल द्वीप की। यह द्वीप Israel के लिए ‘आज़माइश’, अमेरिका की ‘ख्वाहिश’, दुनिया की ‘फरमाइश’ और ईरान के लिए उसके दिल जैसा है।
इस द्वीप का नाम खर्ग द्वीप है। आकार में यह महज कुछ किलोमीटर लंबा है, लेकिन आज यह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकतों और ईरान के बीच रणनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। आसान शब्दों में कहें तो यह ईरान की ‘तेल तिजोरी’ है। ईरान जितना भी कच्चा तेल दुनिया को बेचता है, उसका लगभग 90 प्रतिशत निर्यात इसी द्वीप से होता है।

इसी वजह से अमेरिका और Israel की नजर भी इस पर है। लेकिन इस द्वीप पर एक भी मिसाइल दागने का मतलब होगा—दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लग जाना। यही कारण है कि फिलहाल खर्ग द्वीप इस संघर्ष का एक तरह से ‘नो-गो ज़ोन’ बना हुआ है।
खर्ग द्वीप ईरान के बुशहर प्रांत के तट से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां विशाल स्टोरेज टैंक बने हुए हैं, जिनकी क्षमता करीब 3 करोड़ बैरल तेल तक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस द्वीप के तेल टर्मिनल को नष्ट कर दिया जाए, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को रातों-रात भारी झटका लग सकता है।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को मिलने वाला बड़ा हिस्सा भी इसी तेल व्यापार से आता है। 2024 में कड़े प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने तेल बेचकर लगभग 78 अरब डॉलर की कमाई की, और इसका बड़ा हिस्सा खर्ग द्वीप के जरिए ही दुनिया तक पहुंचा।

हाल के वर्षों में ईरान ने यहां से तेल निर्यात बढ़ाकर करीब 40 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा दिया है। साफ है कि ईरान युद्ध की आशंका के बीच अपनी आर्थिक ताकत मजबूत करने में जुटा है, क्योंकि यही आय उसके मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों को भी सहारा देती है।
दिलचस्प बात यह है कि खर्ग द्वीप दशकों से अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए भी एक रणनीतिक पहेली रहा है। 1979 के ईरानी बंधक संकट के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर को सलाह दी गई थी कि खर्ग द्वीप पर कब्जा कर लिया जाए, ताकि तेहरान को झुकने पर मजबूर किया जा सके। लेकिन कार्टर ने यह कदम नहीं उठाया, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में लंबी और खतरनाक आग भड़क सकती है।
1980 के दशक में जब रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति थे और ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं, तब भी अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर हमला किया, लेकिन खर्ग द्वीप को नहीं छुआ।

आज भी, जब Israel ने तेहरान और अल्बोर्ज के कई ईंधन डिपो को निशाना बनाया है, तब भी खर्ग द्वीप अछूता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन जानता है कि खर्ग पर हमला करना ‘मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने’ जैसा होगा।
यदि इस द्वीप पर हमला होता है, तो ईरान के पास खोने के लिए बहुत कम बचेगा। ऐसी स्थिति में वह सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देशों के तेल ढांचे पर बड़े हमले कर सकता है। यही डर अमेरिका और उसके सहयोगियों को सीधे हमले से रोकता रहा है।
फिलहाल अमेरिका खर्ग द्वीप को एक ‘प्रेशर पॉइंट’ की तरह देखता है। रणनीति यह है कि इस खतरे के दबाव में ईरान को बातचीत की मेज पर लाया जाए।

आने वाले दिन तय करेंगे कि खर्ग द्वीप ईरान की ढाल बना रहेगा या उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगा। लेकिन इतिहास यही बताता है कि यह वह जगह है, जिसे दुश्मन धमकी देने के लिए इस्तेमाल तो करता है, पर इसे नष्ट करने का जोखिम उठाने से बचता है।
क्योंकि खर्ग द्वीप पर होने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा संकट की सुनामी बन सकता है। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर उसके तेल ढांचे को निशाना बनाया गया, तो वह पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क को तबाह करने से पीछे नहीं हटेगा।
