Sheetla Ashtami, जिसे बास्योड़ा भी कहा जाता है, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू त्योहार है। यह त्योहार माता शीतला को समर्पित है, जो रोगों, विशेषकर चेचक, खसरा और गर्मी से जुड़ी बीमारियों को दूर करने वाली देवी मानी जाती हैं। इस दिन माता को एक दिन पहले बना ठंडा या बासी भोजन भोग लगाया जाता है और श्रद्धालु वही प्रसाद ग्रहण करते हैं।
Sheetla Ashtami मनाने के मुख्य कारण:
स्वास्थ्य और कल्याण: मान्यता है कि माता शीतला की पूजा करने से परिवार को चर्म रोगों, दाह ज्वर (बुखार) और चेचक जैसी संक्रामक बीमारियों से रक्षा मिलती है।
मौसमी संक्रमण से बचाव: यह त्योहार वसंत और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल में आता है, जब मौसमी बीमारियां फैलने का खतरा होता है। शीतला माता को शीतलता की देवी माना जाता है, जो शरीर के ताप को शांत करती हैं।
स्वच्छता का संदेश: इस दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा है, जो स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संदेश देती है।
पौराणिक मान्यता: माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने देवी शीतला को रोगों से मुक्ति दिलाने का कार्य सौंपा था।
इस दिन मुख्य रूप से माता शीतला को ठंडा भोजन, जैसे बासी रोटियां, राबड़ी और दही, अर्पित किया जाता है।
जयपुर/चाकसू: चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला प्रमुख हिंदू पर्व Sheetla Ashtami इस वर्ष भी पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। जयपुर जिले के चाकसू स्थित Sheel Ki Doongri Sheetla Mata Temple में शीतलाष्टमी के अवसर पर दो दिवसीय वार्षिक लक्खी मेले की शुरुआत हुई, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की।
Sheetla Ashtami: बास्योड़ा पर्व की सदियों पुरानी परंपरा
Sheetla Ashtami को बास्योड़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माता को एक दिन पहले बनाया गया ठंडा या बासी भोजन भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि Sheetla Mata की पूजा करने से चेचक, खसरा और गर्मी से जुड़ी बीमारियों से रक्षा मिलती है।
भांडारेज नगरपालिका क्षेत्र के शील का बास स्थित शीतला माता मंदिर में भी बास्योड़ा पूजन का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। तड़के सुबह से ही मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू हो गई और महिलाओं ने एक दिन पहले तैयार किए गए भोजन का भोग लगाकर क्षेत्र में शीतलता और स्वास्थ्य की कामना की।
Sheetla Ashtami: धरोंदा और दशा माता के डोरा की परंपरा
पूजन के बाद ग्रामीण महिलाओं ने शीतला माता की कथा सुनी और पारंपरिक धरौंदा प्रथा निभाई। इस परंपरा के तहत महिलाएं मिट्टी के छोटे-छोटे लड्डू बनाकर उन्हें घर में सुरक्षित रखती हैं, जिन्हें आगामी मानसून तक संजोकर रखा जाता है।
इसके साथ ही महिलाएं दशा माता का डोरा धारण करती हैं, जिसे अच्छे स्वास्थ्य, भाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
Sheetla Ashtami: शील डूंगरी में लगा दो दिवसीय लक्खी मेला
चाकसू की प्रसिद्ध शील डूंगरी बुधवार को आस्था और श्रद्धा के रंग में रंगी नजर आई। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से आए श्रद्धालुओं ने पहाड़ी पर स्थित मंदिर में पहुंचकर माता के दर्शन किए। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 151 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
मेला परिसर में धार्मिक आस्था के साथ उत्सव का माहौल भी देखने को मिला। मंदिर के आसपास लगी दुकानों पर खिलौने, मिठाइयां और पारंपरिक ग्रामीण व्यंजन मेले की रौनक बढ़ाते नजर आए। बच्चों और युवाओं के लिए लगाए गए झूले आकर्षण का केंद्र बने रहे।
Sheetla Ashtami: 600 साल पुराना है मंदिर
इतिहास के अनुसार इस मंदिर का निर्माण जयपुर के पूर्व शासक Maharaja Madho Singh ने करवाया था। मान्यता है कि उनके पुत्रों को चेचक होने पर शीतला माता की कृपा से स्वास्थ्य लाभ मिला था, जिसके बाद उन्होंने शील डूंगरी पर मंदिर और बारहदरी का निर्माण कराया।
आज भी परंपरा के अनुसार मंदिर में पहला भोग जयपुर राजघराने की ओर से भेजे गए प्रसाद से लगाया जाता है।
सुरक्षा और व्यवस्थाओं के विशेष इंतजाम
मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। पूरे मेला क्षेत्र में 240 सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जा रही है और अलग-अलग कंट्रोल रूम बनाए गए हैं।
इसके अलावा यातायात, पार्किंग, साफ-सफाई, पेयजल और आपातकालीन सेवाओं की भी विशेष व्यवस्था की गई है, जिससे श्रद्धालुओं को दर्शन में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का संगम
मंदिर ट्रस्ट के अनुसार शील डूंगरी का यह लक्खी मेला करीब 600 वर्षों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। हर साल जयपुर जिले के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु यहां माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
चाकसू का शीतलाष्टमी मेला सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक माना जाता है।
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