नई दिल्ली: Supreme Court of India ने गुरुवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की क्रीमी लेयर को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर में शामिल करने का फैसला सिर्फ उसकी आय के आधार पर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रीमी लेयर तय करते समय परिवार की सामाजिक स्थिति, सरकारी पद, पेशे और अन्य प्रशासनिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत के अनुसार, केवल आय की सीमा को आधार बनाकर किसी को क्रीमी लेयर में शामिल करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
सामाजिक स्थिति और पद भी होंगे महत्वपूर्ण
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय पदों की श्रेणियों और सामाजिक-प्रशासनिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि क्रीमी लेयर की पहचान के लिए तय मानदंडों का संतुलित और व्यापक तरीके से पालन होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय के उद्देश्य सही ढंग से पूरे हो सकें।

क्या है OBC की क्रीमी लेयर
OBC वर्ग में आर्थिक और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों को क्रीमी लेयर कहा जाता है। ऐसे परिवार जिनकी आय अधिक है या जिनके माता-पिता उच्च सरकारी पदों या प्रभावशाली पेशों में हैं, उन्हें क्रीमी लेयर में रखा जाता है।
सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई है ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुंच सके। क्रीमी लेयर में आने वाले लोगों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, जबकि नॉन-क्रीमी लेयर के उम्मीदवार आरक्षण के पात्र होते हैं।
1992 के ऐतिहासिक फैसले से शुरू हुई व्यवस्था
क्रीमी लेयर की अवधारणा की शुरुआत 1992 के ऐतिहासिक मामले Indra Sawhney vs Union of India के बाद हुई थी। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण को बरकरार रखते हुए यह निर्देश दिया था कि संपन्न वर्ग को आरक्षण से बाहर रखा जाए।
इसके बाद 1993 में सरकार ने क्रीमी लेयर से संबंधित नियम लागू किए।
अभी क्या है आय सीमा
वर्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी OBC परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसी स्थिति में उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में OBC आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते।
यह आय सीमा आखिरी बार 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।
नियमों की समीक्षा का बढ़ सकता है दबाव
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार पर 1993 के क्रीमी लेयर नियमों की समीक्षा का दबाव बढ़ सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि केवल आर्थिक मानदंड को आधार बनाना सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह टिप्पणी भविष्य में OBC आरक्षण से जुड़े मामलों और नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकती है।
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