Modi-Pezeshkian फ़ोन पर बातचीत: चाहे यूक्रेन हो या मध्य पूर्व, जब भी दुनिया भर में अशांति की लपटें भड़कती हैं, तो दुनिया की बड़ी ताकतें समाधान का कोई फ़ॉर्मूला खोजने के लिए बार-बार भारत की ओर देखती हैं। इस सूची में शामिल होने वाला सबसे नया नाम ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का है। शनिवार को, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फ़ोन पर एक लंबी और महत्वपूर्ण बातचीत की।
Modi-Pezeshkian: बताया जा रहा है कि इस फ़ोन कॉल की शुरुआत तेहरान की ओर से हुई थी। मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य में—खासकर इज़रायल और पश्चिम एशियाई देशों के बीच पैदा हुए भारी तनाव को देखते हुए—दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच हुई इस बातचीत में एक साझा भावना उभरकर सामने आई: कि स्थिति को शांत करने के लिए भारत का हस्तक्षेप और मध्यस्थता बेहद ज़रूरी है।

Modi-Pezeshkian: आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस बातचीत का मुख्य केंद्र गाज़ा और लेबनान में बनी मौजूदा स्थिति थी। प्रधानमंत्री मोदी हमेशा से ही बातचीत के ज़रिए मुद्दों को सुलझाने की वकालत करते रहे हैं। शनिवार को हुई इस बातचीत के दौरान, उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि बेकसूर लोगों की जान जाना और क्षेत्रीय अस्थिरता, ये दोनों ही बातें किसी के लिए भी अच्छी नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर, ईरानी राष्ट्रपति ने मौजूदा संकट से निपटने में भारत की प्रभावशाली कूटनीतिक भूमिका की सराहना की।
Modi-Pezeshkian: रिपोर्ट्स से यह भी पता चलता है कि मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति को लाल सागर में जहाज़रानी में आ रही रुकावटों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर भारत की चिंताओं से अवगत कराया। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर भारत के उस पुराने और अटल रुख को दोहराया: कि वह संघर्ष के बजाय शांति के पक्ष में मज़बूती से खड़ा है।

Modi-Pezeshkian: कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, मोदी और पेज़ेश्कियन के बीच हुई यह बातचीत महज़ एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक दांव था जिसका मकसद एशिया के लोगों को युद्ध की तबाही से बचाना था। यह फ़ोन कॉल मध्य पूर्व में शांति बहाल करने के लिए भारत की “सॉफ्ट पावर” (नरम शक्ति) को मिली वैश्विक पहचान और सराहना का एक जीता-जागता सबूत है। युद्ध की मौजूदा स्थिति से परे हटकर, दोनों नेताओं ने भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ चाबहार बंदरगाह जैसी प्रमुख परियोजनाओं पर भी चर्चा की। इस बातचीत से यह बात पूरी तरह साफ़ हो गई कि युद्ध की मौजूदा उथल-पुथल के बीच, भारत के तेल आयात की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना ही नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।
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