बहुत प्रचार कर लिया, थोड़ा रिफ्रेश हो लिया जाए, थोड़ा फिट हो लिया जाए, थोडी एनर्जी ले ली जाए। बहुत काम करने के बाद, अक्सर हम ऐसा ही सोचते हैं और शायद, देश में भी ऐसा ही माहौल चल रहा है। वैसे, देश में और भी बहुत कुछ चल रहा है, कहीं खास तो कहीं, वही सब नार्मल रूटीन। इसलिए, दिल ने कहा और दिमाग ने सोचा कि कुछ इंद्रधनुषीय करते हैं, ठीक उस विज्ञापण की तरह, जिसकी टैगलाइन है — आज कुछ तूफानी करते हैं।
सबसे पहले, आपको गंगटोक लेकर चलेंगे, जहां पीएम मोदी, युवा खिलाड़ियों के साथ फुटबाल खेलते नजर आए। अक्सर नेता, चुनाव प्रचार करने के बाद, अपने आपको थोड़ा रेस्ट देते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर शायद, रेस्ट का ये फार्मूला लागू नहीं होता।
जरा सोचिए, और पीएम मोदी की एनर्जी कैलकुलेट करिए…..एक तरफ वो बंगाल में रैली कर रहे हैं, जनसभा कर रहे हैं, उसी दिन वे सिक्किम में रोड शो कर रहे हैं। उसके अगले दिन, वे युवा खिलाड़ियों के साथ फुटबाल खेल रहे हैं, सिक्किम के 50वें राज्य स्थापना दिवस समारोह के समापन समारोह शिरकत कर रहे हैं। अब, उन्हें रोबोट तो कह नहीं सकते, क्योंकि रोबोट को ऑन करने के लिए या उसे चलाने के लिए, उसमें सैल डालने पड़ते हैं, या उसे चार्ज करना पड़ता है…लेकिन पीएम मोदी तो शायद वो रोबोटनुमा इंसान होंगे, जो शायद अपने आप को अपने काम से चार्ज करते होंगे…..जितना काम, उतनी चार्जिंग………मानो जिस तरह सोलर प्रॉडक्ट्स के लिए धूप जरूरी होती है, ठीक उसी तरह, मोदी को शायद काम की धूप चाहिए होती होगी……….दुनिया भी ये देखकर अचंभित होती होगी कि आखिर भारत का प्रधानमंत्री वाकई इंसान ही है या कोई ओटोमेटिक रोबोट…….
वैसे, शायद दुनिया के वैज्ञानिक इस पर रिसर्च कर रहे हैं कि भारत का प्रधानमंत्री ‘इंसान’ है या कोई ‘ऑटोमैटिक रोबोट’? अगर रोबोट हैं, तो इसकी मैन्युफैक्चरिंग डिटेल्स साझा की जानी चाहिए, ताकि देश का हर थका हुआ युवा वैसी ही ‘अनंत ऊर्जा’ पा सके। खैर, वो देश के पीएम है, पूरे देश की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, ऐसे में उन्हें ये बेहतर रूप से पता होगा कि उनका इस तरह एक्टिव रहना जरूरी भी है।
सिक्किम से आपको बंगाल ले चलते हैं, जहां दो चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं। और ये चुनाव, देश के इतिहास में कई कारणों से अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा चुके हैं। आजादी के बाद, रिकार्ड तोड़ मतदान प्रतिशत के लिए और शायद, बंगाल के इतिहास में जितनी सुरक्षा व्यवस्था इस बार की गई, आजादी के बाद शायद ही कभी की गई होगी। ये सब आप जानते ही हैं, कल के डेली डोज में हम इस पर विस्तार पूर्वक बात भी कर चुके हैं। बंगाल से चुनाव की खबरें तो पुरानी हो गईं, लेकिन वहाँ की चर्चा अभी भी गरम है। इस बार बंगाल के रण में यूपी के ‘सिंघम’ यानी अजय पाल शर्मा की एंट्री हुई। चुनाव आयोग ने उन्हें ‘साउथ 24 परगना’ जैसी संवेदनशील पिच पर फील्डिंग के लिए भेजा। पुलिस पर्यवेक्षक के तौर पर उनकी तैनाती, बंगाल के चुनाव में की गई थी।
यह दिलचस्प है कि जहाँ टीएमसी का ‘खेला’ चलता था, वहाँ अब ‘सिंघम के तेवर’ देखने को मिले। साउथ 24 परगना……. जो, अभिषेक बनर्जी का, टीएमसी का मजबूत गढ़ मानी जाती है। इस क्षेत्र में अक्सर राजनीतिक हिंसा होती रही हैं….शायद यही वजह रही होगी कि धांधली और हिंसा से सख्ती से निपटने के लिए, उनकी तैनाती यहां की गई होगी…बाकि तो आप समझदार हैं ही, समझ ही गए होंगे कि खेला क्या चल रहा है।
चलिए, बंगाल से आपको देश की राजधानी दिल्ली ले चलते हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार ने आज ‘नारी शक्ति वंदन’ पर दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया…. संसद में संविधान (131वां संशोधन) बिल पास न होने के विरोध में मुख्यमंत्री ने भाजपा विधायकों के मार्च निकाला…… विधायक काली पट्टी बांधकर सदन में पहुंचे थे। सत्र में विपक्षी दलों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया….यानि विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला गया। मंत्री कपिल मिश्रा ने इसे महिलाओं के साथ ‘विश्वासघात’ बताया, वहीं मंत्री परवेश वर्मा ने कहा कि विपक्ष ने एकजुट होकर करोड़ों महिलाओं के सपनों को तोड़ा है।
कुल मिलाकर विरोध प्रदर्शन के माध्यम से सरकार से संदेश देना चाह रही है कि वह महिलाओं के साथ खड़ी है और बिल पास कराने के प्रयास जारी रहेंगे। वैसे, सदन में बिना संख्या बल के…..कहने का मतलब है कि जो नंबर्स चाहिए, यदि वो आपके पास नहीं है तो ये बिल आप कैसे पास कराएंगे ? बेहतर होता यदि दिल्ली की रेखा सरकार, विरोध प्रदर्शन के दौरान, या उसके बाद, जनता को वो गणितीय फार्मूला बता देंती, जिस फार्मूले से सरकार को बिल पास कराने के लिए निर्धारित बहुमत का आंकड़ा मिल जाता। तो साहब, कुल मिलाकर सार यही है कि राजनीति अब वह खेल बन गई है जहाँ खिलाड़ी कोई और है, गोल कोई और कर रहा है और जनता बस, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ में बैठी रेफरी की सीटी का इंतज़ार कर रही है।
राजनीति अब नीतियों से ज्यादा ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का खेल बन गई है। एक तरफ पीएम मोदी की ‘रोबोटिक’ ऊर्जा है जो थकान को पहचानती नहीं, तो दूसरी तरफ दिल्ली की रेखा सरकार का वह ‘गणितीय विलाप’ है, जो बिना नंबरों के जीत का दावा करता है। सवाल सीधा है : क्या लोकतंत्र सिर्फ, टीवी स्क्रीन पर ‘तूफानी’ दिखने के लिए है ? सत्ता चाहे फुटबॉल के मैदान में गोल करे या विधानसभा में काली पट्टी बांधकर मार्च निकाले, अगर जनता के बुनियादी सवाल ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हैं, तो यह सब सिर्फ एक हाई-बजट मनोरंजन है। बाकी तो सब ‘मिक्स नमकीन’ है — चटखारे लेते रहिए, क्योंकि इस देश में सियासत से बड़ा मनोरंजन और कोई दूसरा नहीं है।
