बंगाल संग्राम : 29 अप्रैल का महामुकाबला! मोदी vs दीदी या आयोग का सख्त पहरा ?

Rakesh Sharma - National Head
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पश्चिम बंगाल में आज शाम 5 बजे सन्नाटा छा गया… लेकिन ये सन्नाटा शांति का नहीं, उस तूफान से पहले की खामोशी है जो 29 अप्रैल को आने वाला है। दूसरे और अंतिम चरण का प्रचार थम चुका है। 142 सीटें, 8 जिले और एक ऐसा चुनावी करंट, जो दिखाई नहीं दे रहा, पर महसूस हर उम्मीदवार की धड़कनों में हो रहा है। आज बात, उस जंग की, जो अब सिर्फ ‘दीदी बनाम मोदी’ नहीं रही, बल्कि ‘इलेक्शन कमीशन बनाम बंगाल का इतिहास’ बन चुकी है।

बंगाल में दूसरे चरण का चुनाव प्रचार आज थम गया। लेकिन इस बार माहौल में सिर्फ चुनावी नारों की गूंज नहीं है, बल्कि बूटों की वो धमक है, जो दिल्ली से भेजी गई है। लोग कह रहे हैं कि ये चुनाव ‘दीदी बनाम मोदी’ है, पर अगर आप थोड़ा गौर से देखेंगे, तो ये मुकाबला ‘इलेक्शन कमीशन बनाम बंगाल के पुराने पैटर्न’ के बीच है। आज हम बात करेंगे उस ‘डिजिटल पहरेदारी’ की, जिसने ‘धांधली’ करने वालों की नींद उड़ा दी है। आयोग ने इस बार ऐसी घेराबंदी की है, कि अगर कोई ‘भूत’ भी फर्जी वोट डालने आएगा, तो उसका भी आधार कार्ड मांग लिया जाएगा।

बंगाल में चुनाव शांति से हो जाए, ये खबर वैसी ही अकल्पनीय लगती थी, जैसे ‘बिना मसाले के बंगाली करी’। लेकिन चुनाव आयोग ने इस बार ठान लिया है कि ‘शांति’ तो होकर रहेगी, चाहे इसके लिए पूरा दिल्ली ही, कोलकाता क्यों न शिफ्ट करना पड़े। चुनाव आयोग ने इस बार ‘जीरो टॉलरेंस’ को किताबी शब्द से निकालकर, जमीन पर उतार दिया है। राज्य के हर एक बूथ की लाइव स्ट्रीमिंग सीधे दिल्ली के कंट्रोल रूम में होगी। मतलब, अगर पोलिंग एजेंट ने गलती से भी अंगड़ाई ली, तो चुनाव आयुक्त को पता चल जाएगा। इस बार माइक्रो-ऑब्जर्वर्स और जवानों के शरीर पर बॉडी कैमरा लगे हैं। ये उन ‘दबंगों’ के लिए है, जो कैमरे के सामने तो मुस्कुराते हैं, पर पीछे से इशारा करते हैं। अब उनकी हर मुस्कुराहट और हर इशारा ‘रिकॉर्ड’ हो रहा है। पहली बार संवेदनशील इलाकों में ड्रोन तैनात हैं। यही नहीं, ऐसी सॉफ्टवेयर तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, जो भीड़ में भी संदिग्ध चेहरों को पहचान लेगी।

व्यंग्य देखिए, जिस बंगाल ने ‘कला और साहित्य’ में दुनिया को रास्ता दिखाया, वहां आज एक ‘बटन’ दबवाने के लिए इतनी टेक्नोलॉजी लगानी पड़ रही है, जैसे हम मंगल ग्रह पर रॉकेट भेज रहे हों। पहले चरण में 92.7% वोटिंग हुई। ये आंकड़ा इतना बड़ा है कि कई राज्यों की कुल जनसंख्या भी इसके आगे कम पड़ जाए।
और अब, ये आकंड़ा भी बढ़ गया है। पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान की जांच के बाद, मतदाता मतदान प्रतिशत (voter turnout) में और वृद्धि हुई है। राज्य में अंतिम मतदान 93.19 प्रतिशत रहा, जिसे चुनाव आयोग ने स्वतंत्रता के बाद से अब तक का सबसे अधिक मतदान बताया है। आजादी के बाद की सबसे ज्यादा वोटिंग। इसका मतलब समझ ही गए होंगे आप बंगाल में मतदान का रिकार्ड टूट गया है।

बंगाल चुनाव 2026पहला चरण 93.19
बंगाल चुनाव 202185.2
बंगाल चुनाव 201682.2
बंगाल चुनाव 201184.6
बंगाल चुनाव 200582.0
बंगाल चुनाव 200175.3
बंगाल चुनाव 199682.9
बंगाल चुनाव 199176.8
बंगाल चुनाव 198775.7
बंगाल चुनाव 198276.8
बंगाल चुनाव 197756.2

1977 में 56 प्रतिशत पर सिमटने वाला बंगाल, आज 93 प्रतिशत के पार है। चुनाव आयोग कह रहा है — ये हमारी सुरक्षा का असर है कि डरा हुआ वोटर बाहर निकल रहा है। वहीं विपक्षी दल कह रहे हैं — ये तो हमारी लोकप्रियता है। लेकिन व्यंग्य ये है कि इतनी भारी वोटिंग के बाद अब, राजनैतिक पंडितों को ये डर सता रहा है कि कहीं ये ‘ओवर-वोटिंग’ उनके ही गणित का ‘फ्यूज’ न उड़ा दे। प्रचार के आखिरी दिन नेताओं ने अपनी डिक्शनरी के सारे भारी शब्द इस्तेमाल कर डाले। मोदी— शाह — योगी।

वहीं, एक दिन पहले, दीदी ने स्कूटर पर बैठकर बता दिया कि पेट्रोल भले ही महंगा हो, पर उनकी ‘राजनैतिक गाड़ी’ पूरी रफ्तार में है। चुनाव में ‘विकास’ की बातें वैसे ही गायब हैं, जैसे बंगाल के रसगुल्ले से मिठास गायब करना नामुमकिन है।

“मुद्दा मछली है, मुद्दा अस्मिता है… और अब तो मुद्दा ‘झालमुड़ी’ भी बन गया है! 19 अप्रैल को, झारग्राम की सड़क पर जब पीएम मोदी का काफिला रुका, तो लगा कोई बड़ी सुरक्षा ड्रिल होगी। पर मोदी जी तो वहां ‘झालमुड़ी’ का स्वाद लेने उतर गए। मोदी जी ने चुटकी लेते हुए कहा— ‘झालमुड़ी मैंने खाई, लेकिन झाल (तीखा) टीएमसी को लगा है।’ उधर ममता दीदी इसे ‘स्क्रिप्टेड’ बता रही हैं, लेकिन बंगाल की गलियों में चर्चा अब इस बात की है कि क्या ये ‘तीखी झालमुड़ी’ 4 मई को चुनावी नतीजों का स्वाद भी बदल देगी ?” इन सबके बीच, एक मुद्दा और है…… और वो ‘डर’ है, जिसे निकालने के लिए ढाई हजार से ज्यादा CAPF कंपनियां राज्य की सड़कों पर मार्च कर रही हैं।

आयोग ने इस बार ‘बाइक रैलियों’ और रात के घूमने-फिरने पर भी कैंची चला दी है। शाम 6 से सुबह 6 तक बाइक चलाना मना है। क्यों ? क्योंकि रात के अंधेरे में अक्सर ‘लोकतंत्र की सेवा’ के नाम पर कुछ और ही बंटता है। बाइक पर पीछे बैठने यानी ‘पिलियन राइडिंग’ पर भी रोक है। चुनाव आयोग शायद जानता है कि एक बाइक पर बैठे दो लोग अक्सर वोट मांगने नहीं, बल्कि ‘वोट डराने’ निकलते हैं। कहने को ये चुनाव है, लेकिन बंगाल की गलियों में इसे ‘ऑपरेशन फेयर पोल’ कहा जा रहा है। चुनाव आयोग ने इस बार कमर नहीं कसी, बल्कि अभेद्य किला तैयार किया है। इतिहास गवाह है — बंगाल में वोटिंग और हिंसा अक्सर साथ-साथ चलते थे। बूथ कैप्चरिंग और डरा हुआ वोटर यहां की कड़वी सच्चाई रही है। लेकिन 2026 का ये रण अलग है। आयोग ने ‘रिकॉर्ड तोड़’ CAPF की तैनाती की है।

जानकारों की मानें तो इतनी सख्त घेराबंदी पहले कभी नहीं देखी गई। इस बार हार-जीत से ज्यादा चर्चा इस बात की होगी कि क्या बंगाल ने वाकई डर को पीछे छोड़ दिया है? तो साहब, बंगाल का ये ‘महासंग्राम’ अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। एक तरफ वो हैं, जो ‘सोनार बांग्ला’ बनाना चाहते हैं, दूसरी तरफ वो, जो अपना ‘किला’ बचाना चाहते हैं। पर इन सबके बीच वो आम आदमी है, जिसे 5 साल तक कोई नहीं पूछता, लेकिन आज उसकी उंगली की स्याही की कीमत, ‘दीदी’ और ‘पीएम’ दोनों को पता है। एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और 5G की बातें करते हैं, और दूसरी तरफ हमें ये सुनिश्चित करने के लिए हजारों जवानों की जरूरत पड़ती है कि एक नागरिक अपनी मर्जी से बटन दबा सके।

बंगाल का ये चुनाव सिर्फ ईवीएम का बटन दबाने का मौका नहीं है, बल्कि उस दाग को धोने की कोशिश है जो दशकों से राजनीतिक हिंसा के नाम पर, इस मिट्टी पर लगा है। 29 अप्रैल को 142 सीटों पर होने वाला मतदान ये तय करेगा कि क्या सुरक्षा के कड़े पहरे में लोकतंत्र वाकई अपनी पूरी ताकत से सांस ले पाता है या नहीं ?? सत्ता ‘दीदी’ की रहेगी या ‘भगवा’ रंग चढ़ेगा, ये तो 4 मई को पता चलेगा… लेकिन फिलहाल, बंगाल के रगो में दौड़ रहा ये ‘चुनावी करंट’, आने वाले बड़े बदलाव की गवाही दे रहा है। वोट जरूर दीजिएगा, क्योंकि इस बार सीसीटीवी कैमरा नहीं, आपकी अंतरात्मा भी, शायद आपको देख रही है।

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