हमें हमेशा ऐसा लगता है कि हम जो खाते हैं, उस पर हमारा कंट्रोल है, या हमें पता है जो हम खा रहे हैं वो सही है या नहीं लेकिन हमारी इंद्रियां लगातार इस बात पर असर डालती हैं कि हम क्या खरीदते हैं और कितना खाते हैं। आज की इस स्टोरी में बात करेंगे कि कैसे हम अपने खाने के तरीकों को और बेहतर बना सकते हैं
कानों से स्वाद का अनुभव
शायद आपको इसका एहसास न हो, लेकिन आप अपने कानों से भी स्वाद का अनुभव कर सकते हैं। ज़रा सोचिए, सब्जी कुकर में पकने आवाज़ या सॉफ्ट ड्रिंक का कैन खुलने की आवाज़ – क्या इनसे आपके स्वाद की ग्रंथियां (टेस्ट बड्स) सक्रिय नहीं हो जातीं? और पिछली बार जब आपने किसी रेस्टोरेंट में खाना खाया था, तो वहां बज रहे संगीत के बारे में क्या ख्याल है? क्या आपने ध्यान दिया कि उस संगीत का आपके खाने के मज़ा लेने के अनुभव पर क्या असर पड़ा?
असल में, किसी चीज़ का स्वाद लेने से पहले ही हमारा दिमाग़ खाने के बारे में अंदाज़ा लगाने लगता है जैसे वह कैसा दिखता है, कैसी आवाज़ करता है, कैसा महसूस होता है या कैसी महक देता है। अक्सर हमें इसका पता भी नहीं चलता। लेकिन हमारी आँखों, कानों, उंगलियों और नाक से मिलने वाली जानकारी इस बात में अहम भूमिका निभाती है कि हम खाने का कितना मज़ा लेते हैं और अंत में कितना खाते हैं।
चमकीली पैकेजिंग से रहें सावधान
उदाहरण के लिए, जब हम खरीदारी करते हैं, तो चीज़ें चुनने में हमारी आँखों की बड़ी भूमिका होती है। पैकेज का रंग, ब्रांड का लोगो और यहाँ तक कि पैकेजिंग कितनी चमकदार है, ये सब हमारे दिमाग को यह सोचने के लिए तैयार करते हैं कि अंदर का खाना कैसा होगा।
और जब खाना देखने में आकर्षक लगता है, तो वह हमें ज़्यादा पसंद आता है। एक स्टडी में पाया गया कि लोगों ने हेल्दी खाने की तस्वीरों को काफ़ी ज़्यादा बार चुना जब उनके रंग ज़्यादा चमकीले थे, भले ही उसके ठीक बगल में अनहेल्दी खाना भी रखा हो। यह “सेलियंस बायस” (salience bias) नाम के कॉन्सेप्ट पर आधारित है, जिसका मतलब है कि हमारा ध्यान उन चीज़ों की ओर ज़्यादा जाता है जो सबसे ज़्यादा आकर्षक या ध्यान खींचने वाली होती हैं।
चेकआउट के समय लालच से बचें
सुपरमार्केट अक्सर आकर्षक सामान को चेकआउट के पास और ज़्यादा महंगे सामान को आँखों के लेवल पर रखते हैं, जिससे हम ऐसे सामान खरीद और इस्तेमाल कर लेते हैं जिन्हें खरीदने का हमारा कोई इरादा नहीं था।
जब चेकआउट काउंटर से मिठाई जैसे अनहेल्दी स्नैक्स हटा दिए जाते हैं, तो बिना सोचे-समझे उन्हें खरीदने का लालच खत्म हो जाता है। दूसरी रिसर्च से पता चला है कि जब चेकआउट काउंटर के पास फल रखे जाते हैं, तो ग्राहक ज़्यादा फल खरीदते हैं।
भारी कटोरे में खाएं
जब डेज़र्ट को सफ़ेद गोल प्लेट में परोसा जाता है, तो अक्सर उन्हें काली कोणीय प्लेट में परोसे गए उन्हीं डेज़र्ट की तुलना में ज़्यादा मीठा माना जाता है। पैकेजिंग के आकार के मामले में भी ऐसा ही असर देखने को मिलता है – लोग कोणीय पैकेजिंग के बजाय गोल आकार की पैकेजिंग को ज़्यादा पसंद करते हैं।
अपनी प्लेट को सुंदर बनाएं
शायद इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हमारी प्लेट में खाना कैसे परोसा जाता है, इसका असर इस बात पर भी पड़ता है कि हम खाने का कितना मज़ा लेने की उम्मीद करते हैं; साथ ही, इससे कम कैलोरी वाला खाना भी ज़्यादा आकर्षक लग सकता है। एक स्टडी में सलाद को कैंडिंस्की की पेंटिंग की तरह सजाया गया, जिससे लोगों को वह खाना ज़्यादा स्वादिष्ट लगा और उसी सामग्री के लिए उन्होंने ज़्यादा पैसे देने की इच्छा जताई, क्योंकि उसे खास तरीके से परोसा गया था।
धीरे संगीत चलाएं
आवाज़ एक और छिपा हुआ तत्व है जिसका इस्तेमाल हमारे खाने के तरीके को बदलने के लिए किया जा सकता है; इस कॉन्सेप्ट को “सोनिक सीज़निंग” नाम दिया गया है। उदाहरण के लिए, धीमा संगीत हमें धीरे-धीरे खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। आप संगीत के ज़रिए खाने के मीठे या कड़वे स्वाद को भी बदल सकते हैं – ऊँची पिच वाला संगीत मिठास से जुड़ा होता है, जबकि कम पिच वाला संगीत कड़वाहट को उभारता है, जिससे टॉफ़ी जैसी मीठी चीज़ें भी कड़वी लग सकती हैं।
हेल्दी खाना शामिल करके खाने की मात्रा बढ़ाएँ
हालांकि आवाज़ हमारे खाने की पसंद पर थोड़ा-बहुत असर डालती है, लेकिन खाने की बनावट में बदलाव करके हम अपनी कैलोरी की खपत को काफ़ी कम कर सकते हैं। ऐसा करने का एक तरीका यह है कि खाने की मात्रा तो वही रखी जाए, लेकिन उसकी एनर्जी डेंसिटी या कैलोरी कम कर दी जाए। रिसर्च से बार-बार यह पता चला है कि हम खाने की मात्रा उतनी ही खाते हैं, चाहे उसमें कैलोरी कितनी भी हो।
Edited by: Bhoomi Goyal
