मराठी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता Sayaji Shinde अपनी मां की याद में 5000 पेड़ लगा रहे हैं, और सरकार विकास के नाम पर हजारों पेड़ काट रही है! यह हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
एक तरफ मराठी सिनेमा और भारतीय फिल्म जगत के जाने-माने अभिनेता Sayaji Shinde हैं, जो अपनी मां की स्मृति को जीवित रखने के लिए धरती में जीवन बो रहे हैं। दूसरी तरफ सरकारें हैं, जो हरियाली को फाइलों और परियोजनाओं के नीचे दफन कर रही हैं। Sayaji Shinde ने 5000 पेड़ लगाए क्योंकि उन्हें मां की याद को सांसों में जिंदा रखना था। सरकारी तंत्र हजारों पेड़ काट रहा है क्योंकि उन्हें “विकास” को कागजों में जिंदा रखना है।
विडंबना देखिए, जिस पेड़ को बड़ा होने में 20-30 साल लगते हैं, उसे काटने की अनुमति एक बैठक में मिल जाती है। जिस छांव को प्रकृति दशकों में तैयार करती है, उसे बुलडोजर कुछ घंटों में खत्म कर देता है। फिर उसी कटे हुए जंगल के पास एक बोर्ड लगा दिया जाता है, पर्यावरण संरक्षण हमारी प्राथमिकता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई पहले घर में आग लगाए और फिर बाल्टी लेकर फोटो खिंचवा ले कि देखिए, मैं आग बुझाने आया हूं।
आज सरकारों का विकास मॉडल भी बड़ा दिलचस्प है। पहले पेड़ काटो, फिर प्रदूषण बढ़े तो ऑक्सीजन पार्क बनाओ, फिर पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाकर फोटो खिंचवाओ और फिर अगले प्रोजेक्ट के लिए वही पौधा भी उखाड़ दो।
पेड़ अब प्रकृति की जरूरत कम और सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों की सामग्री ज्यादा बन गए हैं। कागजों में लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन जमीन पर अक्सर उनकी जगह सिर्फ गड्ढे दिखाई देते हैं। एक अभिनेता अपनी मां की याद में जंगल उगा रहा है, और व्यवस्था विकास की दौड़ में जंगलों को यादों में बदल रही है। प्रकृति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसे बचाने वाले लोग अपने पैसे, समय और भावनाएं लगाते हैं, जबकि उसे नष्ट करने वालों को सरकारी बजट और प्रशासनिक मंजूरी दोनों मिल जाती हैं और फिर हम हैरान होते हैं कि गर्मी 50 डिग्री क्यों पहुंच रही है, नदियां क्यों सूख रही हैं, हवा में सांस लेना मुश्किल क्यों हो रहा है। शायद इसलिए कि पेड़ लगाने वालों की संख्या कम है, और पेड़ काटने वालों के पास सत्ता ज्यादा है।
मराठी फिल्मों के अभिनेता Sayaji Shinde ने मां के नाम 5000 पेड़ लगाए हैं। सरकार चाहे तो इसे श्रद्धांजलि समझ सकती है, लेकिन अगर चाहे तो इसे अपने लिए एक आईना भी मान सकती है। क्योंकि पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वे यह भी बताते हैं कि सभ्यता कितनी संवेदनशील है और जिस समाज में एक कलाकार पेड़ बचाने के लिए आगे खड़ा हो, जबकि सरकार पेड़ काटने के लिए तर्क ढूंढ रही हो, वहां समस्या पर्यावरण की नहीं, सोच की होती है।
