राजस्थान कांग्रेस में राजनीति कभी खत्म नहीं होती, यहां कुर्सियां बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन “नेतृत्व की लड़ाई” हमेशा स्थायी संपत्ति बनी रहती है। अब पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot ने एक मुस्कुराते हुए वाक्य में ऐसा सियासी बम फोड़ा है, जिसकी गूंज जयपुर से लेकर दिल्ली दरबार तक सुनाई दे रही है। उन्होंने नए कांग्रेस भवन कार्यालय के उद्घाटन के दौरान PCC चीफ Govind Singh Dotasra की तरफ देखते हुए कह दिया, “2028 का चुनाव आपके ही नेतृत्व में होगा, नया अध्यक्ष चुनाव के बाद आएगा।” बस, इतना सुनना था कि कांग्रेस के अंदर फिर वही पुराना धारावाहिक शुरू हो गया, नेतृत्व किसका? चेहरा कौन? कुर्सी किसकी? और सबसे बड़ा सवाल, दिल्ली आखिर चाहती क्या है?
राजस्थान कांग्रेस की हालत उस संयुक्त परिवार जैसी हो गई है, जहाँ शादी से पहले ही विरासत के झगड़े शुरू हो जाते हैं। अभी चुनाव दूर हैं, जनता के मुद्दे दूर हैं, संगठन कमजोर है, लेकिन नेताओं को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि 2028 में पोस्टर पर फोटो किसकी होगी। गहलोत राजनीति के पुराने जादूगर हैं। वे सीधे वार कम और मुस्कुराकर संदेश ज्यादा देते हैं। उनका यह बयान सिर्फ डोटासरा की तारीफ नहीं था, यह एक “सियासी लाइन” थी, जो सीधे Sachin Pilot खेमे तक गई। संदेश साफ था, “अभी संगठन की चाबी डोटासरा के पास ही रहेगी, और फिलहाल दिल्ली भी यही चाहती है।” यानी पायलट समर्थकों को फिर वही पुराना आश्वासन मिलेगा— “थोड़ा और इंतजार कीजिए, समय आने पर सब ठीक होगा।”
राजस्थान कांग्रेस में “समय आने” का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है। यहाँ समय इतना धीरे आता है कि कई नेता इंतजार करते-करते वरिष्ठ नागरिक श्रेणी में पहुँच जाते हैं। असल में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं है, कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या “कांग्रेस के अंदर की कांग्रेस” है। एक गुट दूसरे गुट को हराने में इतनी ऊर्जा लगा देता है कि सामने वाली पार्टी आराम से चुनाव निकाल ले जाती है। भाजपा शायद इस पूरे घटनाक्रम को देखकर मुस्कुरा रही होगी। उसे पता है कि जब विपक्ष खुद ही नेतृत्व तय करने में उलझा हो, तब सत्ता पक्ष को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मज़ेदार बात देखिए, राजस्थान में जनता पानी, बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और किसानों की परेशानियों पर जवाब चाहती है, लेकिन राजनीति अभी भी इस मोड़ पर खड़ी है कि “प्रदेश अध्यक्ष कौन रहेगा?”
डोटासरा फिलहाल मजबूत दिख रहे हैं क्योंकि वे संगठन और गहलोत, दोनों के भरोसेमंद माने जाते हैं। लेकिन राजस्थान की राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता।यहाँ समर्थन भी मौसम की तरह बदलता है और बयान भी। आज जो नेता “2028 का चेहरा” बताया जा रहा है, वही कल “संगठनात्मक बदलाव” का हिस्सा भी बन सकता है। क्योंकि कांग्रेस में फैसले राजनीति से कम और समीकरणों से ज्यादा तय होते हैं। आने वाले समय में तीन चीजें साफ दिखाई दे सकती हैं।
पहला: डोटासरा संगठन की कमान संभाले रखेंगे और गहलोत खेमे का प्रभाव बना रहेगा।
दूसरा: पायलट समर्थक समय-समय पर दबाव बनाते रहेंगे ताकि नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा जिंदा रहे।
तीसरा: दिल्ली आलाकमान वही पुरानी नीति अपनाएगा— “सबको उम्मीद दो,फैसला आखिरी समय तक टालो।”
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति अब विचारधारा से ज्यादा “चेहराधारा” पर आ गई है। यहाँ हर नेता जनता से पहले अपने समर्थकों को संदेश देता है। और जनता? वो हर चुनाव में यही सोचकर वोट देती है कि शायद इस बार नेता आपस में कम लड़ेंगे और जनता की ज्यादा सुनेंगे। लेकिन फिलहाल तो हाल यही है, 2028 अभी बहुत दूर है, पर कांग्रेस में उसकी कुर्सी की लड़ाई अभी से शुरू हो चुकी है। इस पूरे वाक्ये को कुछ यूं भी समझा जा सकता है….
ताज की ख्वाहिश में रिश्ते भी बदल जाते हैं,
सियासत के मौसम में चेहरे भी बदल जाते हैं…
जो कल तक साथ चलने की कसमें खाते थे,
कुर्सी दिखते ही रास्ते भी बदल जाते हैं…”
