एक विदेशी पत्रकार Helle Lyng, एक तीखा सवाल और फिर भारत के वरिष्ठ राजनयिक का ऐसा जवाब जिसकी चर्चा अब पूरी दुनिया में हो रही है।
नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक साझेदारी की बात कर रहे थे वहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक माहौल गरमा गया। एक पत्रकार ने भारत के लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर सवाल उठाए लेकिन जवाब में भारत ने सिर्फ सफाई नहीं दी बल्कि अपने इतिहास, संविधान और लोकतांत्रिक ताकत का ऐसा पक्ष रखा जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है और आज बात उस हाई-वोल्टेज प्रेस ब्रीफिंग की जहां नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng और भारत के वरिष्ठ राजनयिक सिबी जॉर्ज के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
Helle Lyng का प्रेस फ्रीडम पर PM मोदी से सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों पांच देशों की विदेश यात्रा पर हैं। इसी दौरे के दौरान वे नॉर्वे पहुंचे जहां भारत और नॉर्वे के बीच व्यापार, ऊर्जा, ग्रीन टेक्नोलॉजी और वैश्विक सहयोग पर चर्चा हुई लेकिन इस दौरे की सबसे ज्यादा चर्चा किसी समझौते की नहीं बल्कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुई तीखी बहस की हो रही है। दरअसल, नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng ने पहले पीएम मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की थी जब वे नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। Helle Lyng ने दावा किया कि नॉर्वे प्रेस फ्रीडम में दुनिया में नंबर वन है और उन्होंने सवाल उठाया कि पीएम मोदी पत्रकारों के सवाल क्यों नहीं ले रहे।

Helle Lyng ने बाद में यही बात अपने X अकाउंट पर भी पोस्ट कर दी। इसके बाद भारतीय दूतावास ने उन्हें आधिकारिक प्रेस ब्रीफिंग में आने का निमंत्रण दिया।
भारतीय दूतावास ने X पर लिखा— “डियर मिस Helle Lyng आज रात 9:30 बजे होटल रैडिसन ब्लू प्लाज़ा में प्रधानमंत्री की यात्रा पर प्रेस ब्रीफिंग होगी।
आपका स्वागत है, वहां आकर अपने सवाल पूछिए।” प्रेस ब्रीफिंग में Helle Lyng ने सवाल पूछा— “जब हम साझेदारी आगे बढ़ा रहे हैं तो हमें भारत पर भरोसा क्यों करना चाहिए ? क्या आप गारंटी दे सकते हैं कि आपके देश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को रोका जाएगा?”
Tried to ask PM Modi a question on the way to the elevator to, but the closing doors stopped me.
What I was wondering was whether he thinks he deserves the trust of the Nordic countries given his human rights violations and his restrictions on press freedom. pic.twitter.com/W2HFFNcCKh
— Helle Lyng (@HelleLyngSvends) May 18, 2026
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल जवाब देने ही वाले थे कि पत्रकार ने बीच में कहा— “मुझे इसका जवाब अभी चाहिए।” यहीं से माहौल तनावपूर्ण हो गया। भारत के वरिष्ठ राजनयिक और विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने जवाब देना शुरू किया। लेकिन यह सिर्फ एक जवाब नहीं था बल्कि भारत की सभ्यता, लोकतंत्र और वैश्विक भूमिका का एक विस्तृत पक्ष था। सिबी जॉर्ज ने कहा— “भारत 5000 साल पुरानी सभ्यता है। हमने दुनिया को शून्य दिया, योग दिया, शतरंज दिया”। उन्होंने आगे कहा— “जब पूरी दुनिया कोविड महामारी से जूझ रही थी, तब भारत ने 150 से ज्यादा देशों को वैक्सीन और दवाइयां भेजीं। दुनिया ने भारत पर भरोसा किया। भरोसा ऐसे बनता है।” उन्होंने भारत के संविधान का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में मौलिक अधिकारों की पूरी गारंटी है। और फिर उन्होंने वो लाइन कही जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है— “You asked a question… this is my press conference. Let me answer.” यानि… “आपने सवाल पूछा है… यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है… मुझे जवाब देने दीजिए।”
लेकिन बहस यहीं नहीं रुकी। Helle Lyng बार-बार बीच में टोकती रहीं। एक समय तो वे प्रेस ब्रीफिंग छोड़कर बाहर चली गईं लेकिन फिर वापस भी आईं। सिबी जॉर्ज ने आगे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा— “भारत में सरकार बदलने का अधिकार, वोट देने का अधिकार, यही सबसे बड़ा मानवाधिकार है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने 1947 में ही महिलाओं को वोट देने का अधिकार दे दिया था जबकि कई देशों में महिलाओं को यह अधिकार दशकों बाद मिला।
उन्होंने G20 समिट का उदाहरण देते हुए कहा— “रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुश्किल समय में भी भारत ने दुनिया के देशों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया। भारत ने अफ्रीकी देशों की आवाज को वैश्विक मंच दिया। यही भरोसा है।”
सिबी जॉर्ज ने उन रिपोर्ट्स पर भी सवाल उठाए जिनके आधार पर भारत पर आरोप लगाए जाते हैं। उन्होंने कहा— “कुछ लोग NGO की सीमित रिपोर्ट देखकर भारत को समझने की कोशिश करते हैं लेकिन भारत की विशालता और विविधता को नहीं समझते।” हालांकि इस पूरी बहस पर सोशल मीडिया भी दो हिस्सों में बंटा नजर आया। भारत में कई लोगों ने सिबी जॉर्ज के जवाब की तारीफ की और कहा कि उन्होंने मजबूती से भारत का पक्ष रखा। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि पत्रकार का काम सवाल पूछना होता है और सत्ता से जवाब मांगना लोकतंत्र का हिस्सा है। बाद में Helle Lyng ने भी X पर सफाई दी। उन्होंने लिखा— “पत्रकारिता कभी-कभी टकराव वाली होती है। अगर सत्ता में बैठा व्यक्ति मेरे सवालों का जवाब नहीं देता तो मैं बीच में टोककर ज्यादा सटीक जवाब पाने की कोशिश करूंगी। यही मेरा काम है।”
लेकिन अब बड़ा सवाल यही है— क्या यह सिर्फ एक पत्रकार और राजनयिक के बीच बहस थी? या फिर दुनिया के सामने भारत की बदलती वैश्विक छवि और आत्मविश्वास का संकेत? क्या भारत अब पश्चिमी देशों के सवालों का जवाब उसी भाषा में देने लगा है? और क्या वैश्विक मंचों पर भारत अब “रिएक्ट” नहीं बल्कि “काउंटर नैरेटिव” बनाने की रणनीति पर चल रहा है? ओस्लो की इस प्रेस ब्रीफिंग ने सिर्फ एक बहस नहीं दिखाई बल्कि ये भी दिखाया कि आज का भारत वैश्विक मंचों पर सवाल सुनता भी है और जवाब देना भी जानता है।
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