बिहार और दिल्ली की राजनीति में दशकों तक सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे इन दिनों बरगद के पेड़ के नीचे साधना करते दिखाई दे रहे हैं। तस्वीरें देखकर ऐसा लग रहा है कि राजनीति से मोहभंग नहीं हुआ है, बस “लोकेशन” बदल गई है ,पहले सत्ता के पेड़ की छांव में बैठते थे, अब वट-वृक्ष की छांव में बैठ रहे हैं।
कहते हैं बरगद का पेड़ बहुत पुराना होता है और उसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। शायद नेता जी भी भारतीय राजनीति की जड़ों और अपनी राजनीतिक शाखाओं का हिसाब-किताब करने पहुंचे हों। आखिर चुनावी मौसम में जो आत्मचिंतन पार्टी कार्यालयों में नहीं हो पाता, वह कई बार पेड़ के नीचे बड़ी आसानी से हो जाता है।
तस्वीरें देखकर कुछ लोग कह रहे हैं कि नेता जी ध्यान में लीन हैं, जबकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वे अगले राजनीतिक पुनर्जन्म की रणनीति बना रहे हैं। भारतीय राजनीति में साधना और सत्ता का रिश्ता भी बड़ा अद्भुत है। जब पद होता है तो नेता जनता के बीच दिखाई देते हैं, और जब पद नहीं होता तो ईश्वर के अधिक करीब दिखाई देने लगते हैं।
बरगद के नीचे बैठे नेता जी को देखकर ऐसा भी लग रहा है मानो वे प्रकृति से पूछ रहे हों , “हे वट-वृक्ष! बताओ, मेरी राजनीतिक उम्र तुम्हारी उम्र जितनी लंबी कैसे हो?”
सोशल मीडिया पर लोग मजे ले रहे हैं कि यह ध्यान-योग कम और “राजनीतिक रिफ्रेशर कोर्स” ज्यादा लग रहा है। कुछ का कहना है कि नेता जी सत्ता से दूर होकर अध्यात्म की ओर बढ़ गए हैं, जबकि विरोधी पूछ रहे हैं कि कहीं यह अध्यात्म के रास्ते राजनीति में वापसी की तैयारी तो नहीं?
वैसे भारतीय राजनीति में साधु बनने की घोषणा और सक्रिय राजनीति में वापसी के बीच की दूरी अक्सर उतनी ही होती है जितनी बरगद की एक जड़ और दूसरी जड़ के बीच।
फिलहाल इतना तय है कि नेता जी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में “वनवास” भी खबर बनता है और “ध्यान” भी संदेश माना जाता है।
कौन जाने, बरगद के नीचे बैठकर वे मोक्ष खोज रहे हों या फिर अगला चुनावी अवसर!
जब जनता सवाल पूछने लगे तो संवाद करो…
जब कार्यकर्ता सवाल पूछने लगे तो चिंतन करो…
और जब पार्टी सवाल पूछने लगे तो बरगद के नीचे ध्यान करो!
