अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ पिछले काफ़ी समय से बंद है जिसका सीधा असर भारत के लिए इम्पोर्ट हो रहे पेट्रोल पर भी दिखा रहा है और नतीजा पेट्रोल की क़ीमतें आसमान छूती नज़र आ रही है। सिर्फ़ पेट्रोल ही नहीं डीजल के दाम भी बदल रहे हैं और इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर तो क़ीमत ज़्यादा होने का खतरा चल ही रहा है। ऐसे में सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक नई पेशकश की है जिसका नाम है E100। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने E100 फ्यूल को पूरी तरह मंजूरी दे दी है। सरकार का मानना है की इससे फ्यूल इंपोर्ट का खर्चा कम होगा और तेल आयात पर निर्भरता भी कम होगी।
न्यूज़ साईट इंडिया.कॉम की खबर के अनुसार भारत में सालाना करीब 4750 करोड़ लीटर पेट्रोल जलता है। यानी देश में हर दिन करीब 13 करोड़ लीटर पेट्रोल हम रोज़ अपनी गाड़ियों में जला देते हैं।
वहीं डीजल सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला ईंधन है। हम सालाना क़रीब 10,700 करोड़ लीटर डीजल जलाते हैं यानी हर दिन क़रीब 30 करोड़ लीटर डीजल की खपत।
पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाड़ियाँ भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की अपेक्षा सस्ती बनती है जिसके कारण ज्यादातर लोग इन गाड़ियों को ख़रीदते हैं।
ऐसे में सवाल जायज़ है की क्या 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियाँ पेट्रोल की गाड़ियों को सही और सेफ रिप्लेस कर पायेंगी?
E100 ईंधन को मिली मंजूरी
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यह बताया कि E100 ईंधन के उपयोग को मंजूरी दे दी गई है। उनके अनुसार, आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं और अब E100 ईंधन के देश में कानूनी रूप से इस्तेमाल का रास्ता साफ हो गया है।
इस घोषणा के बाद इथेनॉल आधारित ईंधनों को लेकर लोगों के मन में तरह- तरह के सवाल पैदा हो गए हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आने वाले डेढ़ से दो वर्षों में कई वाहन निर्माता कंपनियां, जैसे टोयोटा, हुंडई और एमजी मोटर जैसी कंपनियां, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक से लैस वाहनों को बाजार में उतार सकती हैं।
इसका एक उदाहरण मारुति सुजुकी ने दिया। हाल ही सुजुकी ने अपने एक लोकप्रिय मॉडल वैगनआर का फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण पेश किया था। शुरुआती चरण में इस तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से फ्लीट ऑपरेटरों यानि कैब सर्विस प्रोवाइडर्स और वाणिज्यिक सेवाओं के लिए किया जा सकता है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो भविष्य में इसके और निजी वाहनों के आने की संभावनांए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल आधारित ईंधन का बढ़ता उपयोग ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि, इसके व्यापक क्रियान्वयन के लिए ईंधन आपूर्ति, वाहन अनुकूलता और बुनियादी ढांचे जैसे पहलुओं पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
अब चलिए सबसे पहले समझते हैं की E100 फ्यूल आखिर है क्या?
एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल आधारित जैव ईंधन (बायोफ्यूल) है, जिसे शर्करा (शुगर) और स्टार्च युक्त पदार्थों के फर्मेंटेशन से तैयार किया जाता है। इसका उपयोग पेट्रोल में मिलाकर वैकल्पिक और अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल ईंधन के रूप में किया जाता है। भारत में एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के रस और उससे जुड़े उत्पादों से होता है, हालांकि मक्का, आलू, कसावा और अन्य कृषि आधारित कच्चे माल से भी इसे बनाया जा सकता है।
एथेनॉल तीन जनरेशन में आता है…
फर्स्ट जनरेशन (1G) एथेनॉल
यह एथेनॉल सीधे खाद्य फसलों और शर्करा या स्टार्च युक्त कच्चे माल जैसे गन्ने का रस, मीठा चुकंदर, मक्का, मीठा ज्वार और आलू से तैयार किया जाता है।
सेकेंड जनरेशन (2G) एथेनॉल
यह कृषि अवशेषों और गैर-खाद्य जैविक पदार्थों से बनाया जाता है। इसके लिए चावल और गेहूं की भूसी, कॉर्नकॉब (भुट्टा), बांस तथा अन्य लिग्नोसेल्यूलोसिक बायोमास का उपयोग किया जाता है।
थर्ड जनरेशन (3G) बायोफ्यूल
तीसरी पीढ़ी के बायोफ्यूल के लिए शैवाल (एल्गी) को प्रमुख स्रोत माना जा रहा है। इस तकनीक पर दुनिया भर में शोध और विकास का कार्य जारी है तथा इसे भविष्य के टिकाऊ ईंधन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
अगर हम अभी देखें तो वर्तमान समय में E20 एथेनॉल पहले से ही चल रहा है जिसमें 80 प्रतिशत पेट्रोल और 20 प्रतिशत एथेनॉल का मिश्रण है। इसी को देखते हुए अब 100 प्रतिशत E100 फ्यूल को मंजूरी मिली है।
इसका असर क्या होगा?
देश में E20 ईंधन को इस्तेमाल करने वाले वाहन मालिकों की कुछ चिंताएं भी सामने आई हैं। कई उपभोक्ताओं का दावा है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल के बाद उनके वाहनों का माइलेज प्रभावित हुआ है और रखरखाव (मेंटेनेंस) की लागत में भी बढ़ोतरी देखी गई है।
इस मुद्दे पर सरकार ने भी माना है कि इथेनॉल और पारंपरिक पेट्रोल की ऊर्जा घनत्व (एनर्जी डेंसिटी) में अंतर होने के कारण ईंधन दक्षता पर सीमित प्रभाव पड़ सकता है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) के अनुसार, नियमित पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता कम होती है, जिसके चलते माइलेज में मामूली कमी आ सकती है।
मंत्रालय के मुताबिक, E10 ईंधन के लिए डिज़ाइन किए गए लेकिन E20 के लिए कैलिब्रेट किए गए चार पहिया वाहनों में माइलेज पर अनुमानित प्रभाव 1 से 2 प्रतिशत तक हो सकता है। वहीं, अन्य श्रेणी के वाहनों में यह प्रभाव लगभग 3 से 6 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है।
विशेषज्ञों का कहना है कि E20 के व्यापक उपयोग के लाभ और चुनौतियों का वास्तविक आकलन लंबे समय तक उपयोग और विभिन्न परिस्थितियों में प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल कि आखिर सरकार ऐसा करना क्यों चाहती है?
भारत सरकार अभी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करने के लिए कच्चे तेल को विदेशों से इंपोर्ट करता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों के कारण ज़्यादा खर्च करना पड़ रहा है जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऐसे में सरकार इस क़दम से इंपोर्ट हो रहे तेल पर निर्भरता कम करना चाहती है और देश में तैयार हो रहे एथनॉल के चलते आयात पर हो रहे खर्चे को भी कम करना चाहती है।
सरकार का दावा है कि इसका सबसे ज़्यादा फायदा किसानो को मिलेगा क्योंकि एथनॉल में उपयोग होने वाला सारा सामान खेती और किसानो से जुड़ा है। इसके चलते देश में गन्ना, मक्का, आलू इत्यादि की माँग बढ़ेगी जिससे किसानो की आय में भी बढ़ोतरी होगी।
तो अब देखना यह है की सरकार का यह कदम क्या वाकई में फायदेमंद साबित होगा..
