बिजली के झटके और ‘मोक्ष’ का कारोबार: अंधभक्ति की खौफनाक कहानी

Atul Ahsas
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Image: AI

बिजली के झटके, पेशाब पीने की मजबूरी, और लोग समझते रहे कि ये कोई चमत्कारी बाबा है!

कहते हैं कि 21वीं सदी विज्ञान की सदी है। इंसान चांद पर पहुंच गया, मंगल पर यान भेज दिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना ली, लेकिन अफसोस, दिमाग का “अपडेट” अभी भी कई लोगों तक नहीं पहुंचा है।

हमारे समाज में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो डॉक्टर से ज्यादा बाबा पर भरोसा करते हैं, वैज्ञानिक सोच से ज्यादा चमत्कार पर यकीन करते हैं, और सवाल पूछने से ज्यादा सिर झुकाने को धर्म समझते हैं।

पुणे से सामने आया कथित बाबा राधामोहन मिश्रा का मामला सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज के सामूहिक विवेक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। एक शख्स, जिसने खुद को भगवान बताया। एक कथित गुरु, जिसने दावा किया कि वह बीमारी ठीक कर सकता है, पैसा दिला सकता है, किस्मत बदल सकता है और पारिवारिक संकट दूर कर सकता है। और हैरानी की बात यह नहीं कि राधामोहन मिश्रा ने ऐसा दावा किया, हैरानी की बात यह है कि पढ़े-लिखे लोग भी उस पर यकीन कर बैठे।

पुलिस के अनुसार एक महिला को कथित रूप से बिजली के झटके दिए गए, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी गई और यहां तक कि उसे राधामोहन मिश्रा का पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया।

सोचिए, जिस देश में लोग पानी की एक बोतल खरीदने से पहले उसकी क्वालिटी चेक करते हैं, उसी देश में कुछ लोग “मोक्ष” के नाम पर किसी बाबा का पेशाब भी पी लेते हैं। और फिर कहते हैं कि भारत विश्वगुरु बनने जा रहा है। विश्वगुरु बनने में कोई बुराई नहीं, लेकिन पहले “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” और “चमत्कार विश्वविद्यालय” से डिग्री लेना बंद करना पड़ेगा।

सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसे बाबाओं की दुकान कभी उनके चमत्कारों से नहीं चलती, बल्कि भक्तों की अंधभक्ति से चलती है।

राधामोहन मिश्रा कहता है, “मेरे पास दिव्य शक्ति है।” और यहीं से शुरू होता है अंधभक्ति का कारोबार। यहां धर्म नहीं बिकता, डर बिकता है। यहां अध्यात्म नहीं बिकता, असुरक्षा बिकती है। यहां भगवान नहीं बेचे जाते, बल्कि लोगों की कमजोरियां बेची जाती है। किसी को बीमारी का डर, किसी को गरीबी का डर, किसी को रिश्ते टूटने का डर, और किसी को भविष्य की चिंता, बस यही डर ऐसे कथित चमत्कारी गुरुओं की सबसे बड़ी पूंजी बन जाता है।

पुलिस को कथित तौर पर वहां से लैपटॉप, मोबाइल, हार्ड डिस्क, नकदी, गहने और निजी वीडियो मिले हैं। यानि आश्रम कम, और रहस्यों, दबाव और नियंत्रण का एक पूरा नेटवर्क ज्यादा दिखाई देता है। और तो और, एक कथित अंडरग्राउंड सुरंग के संकेत भी मिले हैं। अब पता नहीं वह सुरंग आध्यात्मिक उन्नति के लिए बनाई जा रही थी या फिर सच को जमीन के नीचे दफन करने के लिए।

लेकिन असली सुरंग तो समाज के दिमाग में बन चुकी है, एक ऐसी सुरंग जिसमें तर्क गायब हो जाता है, विज्ञान गायब हो जाता है, सवाल पूछने की हिम्मत गायब हो जाती है, और बच जाता है सिर्फ अंधविश्वास।

सच तो यह है कि हर ढोंगी बाबा की सफलता के पीछे उसकी चालाकी से ज्यादा समाज की चुप्पी जिम्मेदार होती है। क्योंकि जब लोग सवाल पूछना बंद कर देते हैं, तब ढोंग धर्म बन जाता है। जब लोग सबूत मांगना छोड़ देते हैं, तब पाखंड चमत्कार बन जाता है। और जब लोग अपनी सोच किसी बाबा के चरणों में गिरवी रख देते हैं, तब शोषण शुरू हो जाता है।

इसलिए इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि राधामोहन मिश्रा दोषी है या नहीं, उसका फैसला अदालत करेगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम कब तक हर चोले, हर दाढ़ी और हर प्रवचन को दिव्यता का प्रमाणपत्र मानते रहेंगे? कब तक भगवान के नाम पर इंसानों को भगवान बनाते रहेंगे? और कब तक अपनी बुद्धि को आश्रम के गेट पर जमा करके भीतर प्रवेश करते रहेंगे?

याद रखिए, आस्था अच्छी है, लेकिन अंधभक्ति खतरनाक है।

श्रद्धा जरूरी है, लेकिन सवाल पूछना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

क्योंकि इतिहास गवाह है, सबसे बड़े ठग कभी जेब काटकर नहीं आते, वे पहले विश्वास जीतते हैं, फिर विवेक छीन लेते हैं, और अंत में भक्तों को यह यकीन दिला देते हैं कि शोषण भी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा है।

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