“मेरी खामोशी को हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है” और उस सैलाब के आने की तारीख, शायद 24 अप्रैल 2026 मुकर्रर हुई थी।
आज, आम आदमी से जुड़ी पार्टी को, एक ऐसा झटका लगा है, जिसकी उम्मीद इस पार्टी के संस्थापकों ने शायद ही कभी की होगी। राजनीति में ऐसा अक्सर होता रहता है कि कभी ये दल, कभी वो पार्टी। एक—दो विधायकों या नेताओं ने बगावत की तो ये भी नार्मल बात है। लेकिन आज की राजनीतिक घटना ने पूरे देश को ऐसे चौंका दिया, मानो वे किसी अद्भुत घटना को अपने सामने होता देख रहे हों। और ऐसे में सवाल ये कि जिस आम आदमी के लिए पार्टी बनी थी, आखिर एक के बाद एक, उस पार्टी से नेता दूर क्यों जा रहे हैं ??
आज उस अप्रत्याशित और ऐतिहासिक घटनाक्रम पर नजर डालेंगे, जिसके बीज तो काफी समय पहले बोए जा चुके थे, लेकिन शायद फसल पकने का समय, अप्रैल के महीने में लिखा था। आम आदमी पार्टी के सबसे चर्चित और एक्टिव सांसद, राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया है। जी हां और ये भी कि वे अपने साथ, 6 और सांसदों को ले जा रहे हैं। अब ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) ये मत पूछियेगा कि आखिर आप के सात सांसद पार्टी छोड़कर, आखिर कहां जा रहे हैं क्योंकि जब भी कोई नेता, अपनी पुरानी पार्टी छोड़ता है, तो उसके लिए एक पार्टी के द्वार हमेशा खुले होते हैं, जो वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी का स्थान रखती है भारतीय जनता पार्टी (BJP)। सबसे बड़ी पार्टी हमने इसलिए कहा क्योंकि खुद भाजपा के अनुसार, सदस्यों के हिसाब से, वो दुनिया का सबसे बड़ा दल है।
बीते दिनों, राघव चड्ढा को डिप्टी लीडर पद से हटाया गया था। उनकी जगह, अशोक मित्तल को पार्टी ने राज्यसभा में डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी सौंपी थी। वो सारा घटनाक्रम आपको ध्यान में है ही। उस समय, राघव के बयानों को भी आपने सुना होगा।
“मेरी खामोशी को हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है”। इसके अलावा उन्होंने दिल खोलकर अपनी पीड़ा जाहिर की थी। कहा था — क्या आम आदमी से जुड़े मुद्दे उठाना गुनाह है??
आम आदमी पार्टी को राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर पद से हटाने के बाद, पार्टी और कई नेताओं ने राघव चड्डा पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था — घायल हूं, इसलिए घातक हूं। और आज, पार्टी छोड़ने के फैसले पर गंभीर आरोप लगाते हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने कहा कि आम आदमी पार्टी , अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक गई हैं। ”जिस AAP को मैंने 15 सालों तक अपने खून से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह पूरी तरीके से सिद्धांतों से, अपने मूल्यों से भटक गई है। राघव ने ये भी कहा कि अब ये पार्टी, देशहित के लिए नहीं, बल्कि अपने पर्सनल फायदे के लिए काम कर रही है।
“राजनीति में ‘केजरीवाल मॉडल’ की चर्चा तो बहुत थी, लेकिन राघव चड्ढा ने आज ‘बीजेपी मॉडल’ का ऐसा सब्सक्रिप्शन लिया है कि पूरी आम आदमी पार्टी ही ‘अनइंस्टॉल’ होती दिख रही है। लोग कहते थे कि राजनीति में ‘सफाई’ होनी चाहिए, राघव ने तो झाड़ू से ही सफाई कर दी!” “कहते हैं कि सात फेरों से रिश्ता अटूट होता है, लेकिन राजनीति के सात सांसदों वाला ये ‘सात फेरा’ सीधे कमल के फूल पर जाकर रुका है। एंटी-डफेक्शन लॉ (Anti-Defection Law) को जिस गणित से राघव चड्ढा ने मात दी है, उतना दिमाग तो शायद उन्होंने अपनी CA की पढ़ाई में भी नहीं लगाया होगा।” खैर, आपको ये बता दें कि आप के और कौन से सांसद, पार्टी को अलविदा कह रहे हैं।
7 सांसद —
- राघव चड्ढा
राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (AAP) से राजनीति में कदम रखा. उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली संसदीय सीट से AAP उम्मीदवार के रूप में लड़ा, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने राजेंद्र नगर सीट से जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने. उनके राजनीतिक कद में तब और इजाफा हुआ जब वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया. - स्वाति मालीवाल
स्वाति मालीवाल आम आदमी पार्टी की ओर से दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने वाली राज्यसभा सांसद रही हैं और उनकी पहचान एक मुखर महिला अधिकार कार्यकर्ता के रूप में रही है. वर्ष 2015 से 2024 तक वे दिल्ली महिला आयोग (DCW) की अध्यक्ष रहीं, जहां उन्होंने एसिड अटैक, मानव तस्करी और यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में सख्त रुख अपनाया. हालांकि, पार्टी के भीतर मतभेदों और मुख्यमंत्री आवास से जुड़े कथित विवाद के चलते वे हाल के समय में सुर्खियों में रहीं. - संदीप पाठक
संदीप पाठक आम आदमी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते हैं और उन्हें पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता है. छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले से ताल्लुक रखने वाले संदीप पाठक का शैक्षणिक करियर बेहद उत्कृष्ट रहा है और वे राजनीति में आने से पहले शिक्षाविद थे. अरविंद केजरीवाल और पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने संगठन से जुड़ते हुए चुनावी रणनीतियों की कमान संभाली. पार्टी में उनकी अहमियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें राष्ट्रीय संगठन महासचिव जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई. हालिया राजनीतिक चर्चाओं में उनका नाम उस वक्त केंद्र में आया, जब राघव चड्ढा ने उनके बीजेपी में शामिल होने की बात कही. - अशोक कुमार मित्तल
अशोक कुमार मित्तल एक शिक्षाविद, उद्योगपति और राजनेता हैं, जो आम आदमी पार्टी की ओर से पंजाब से राज्यसभा सांसद रहे हैं. वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक चांसलर हैं. पंजाब के जालंधर में साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले अशोक मित्तल ने शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा संस्थान खड़ा कर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी ने शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया. - हरभजन सिंह
हरभजन सिंह भारत के सबसे सफल ऑफ-स्पिन गेंदबाजों में गिने जाते हैं और राजनीति में आम आदमी पार्टी के जरिए सक्रिय रहे हैं. पंजाब के जालंधर में जन्मे हरभजन ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर की शुरुआत की और दो दशकों तक भारतीय गेंदबाजी आक्रमण की अहम कड़ी बने रहे. वे 2007 टी-20 विश्व कप और 2011 वनडे विश्व कप विजेता भारतीय टीम के प्रमुख सदस्य रहे. क्रिकेट से संन्यास के बाद उन्होंने राजनीति का रुख किया और वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर निर्विरोध राज्यसभा सांसद चुने गए. - राजिंदर गुप्ता
राजिंदर गुप्ता पंजाब के एक बड़े उद्योगपति हैं. वो ट्राइडेंट ग्रुप के संस्थापक और चेयरमैन है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राजिंदर गुप्ता पंजाब से सबसे अमीर व्यक्ति हैं. राजिंदर गुप्ता का जन्म 2 जनवरी 1959 को हुआ था. ट्राइडेंट ग्रुप का मुख्यालय लुधियाना, पंजाब में स्थित है. इस ग्रुप की प्रमुख इंडस्ट्रीज में होम टेक्सटाइल्स, पेपर मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल्स और पावर शामिल हैं. राजनीति में उनकी भूमिका तब और मजबूत हुई जब आम आदमी पार्टी ने उन्हें पंजाब से राज्यसभा सांसद के रूप में संसद भेजा. - विक्रमजीत सिंह साहनी
विक्रमजीत सिंह साहनी एक प्रतिष्ठित उद्योगपति और राजनेता हैं, जो पंजाब से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद रहे हैं. वे अपनी बेदाग छवि और शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र में योगदान के लिए जाने जाते हैं. वर्ष 2022 में राज्यसभा सदस्य बनने के बाद से वे संसद में पंजाब के आर्थिक विकास, प्रवासी भारतीयों (NRI) के हितों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं. सिख समुदाय और कारोबारी जगत में उनके प्रभाव को देखते हुए उनकी राजनीतिक भूमिका को काफी अहम माना जाता है.
एंटी डिफेक्शन लॉ के हिसाब से गणित क्या कहता है ?
भारत के एंटी डिफेक्शन लॉ (संविधान की दसवीं अनुसूची) के तहत अगर किसी पार्टी में टूट (split) को मान्यता चाहिए और अयोग्यता से बचना है, तो राज्यसभा में पार्टी के कम-से-कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य साथ होने चाहिए।
आपको बता दें कि कम-से-कम 7 सांसद साथ आएं, तभी दल-बदल कानून के तहत टूट वैध मानी जाएगी। 7/10 सांसदों का समर्थन राघव चड्ढा के लिए जरूरी होगा, तभी दल-बदल कानून से बचते हुए BJP में जाना संभव होगा। राघव चड्ढा के इस्तीफे पर बोले AAP सांसद संजय सिंह ——— ‘BJP का घटिया राजनीतिक खेल’, ‘सातों सांसदों ने पंजाब के लोगों की पीठ में छुरा घोंपा’। ‘भगवंत मान के अच्छे कामों को रोकने की साजिश’।
राघव चड्ढा के इस्तीफे पर बोले सीएम भगवंत मान
‘पंजाब की इमेज खराब करने की कोशिश’,‘भारतीय जनता पार्टी ने पंजाबियों के साथ गद्दारी की’, ‘भारतीय जनता पार्टी के पास पंजाब में कोई चेहरा नहीं’, ‘पंजाब में बीजेपी की वॉशिंग मशीन चल रही’।
आई एम द राइट मैन इन द रॉन्ग पार्टी- ये राघव चड्ढा कह रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, ”अपने पिछले कुछ सालों से महसूस कर रहा था कि ‘आई एम द राइट मैन इन द रॉन्ग पार्टी’। इसलिए आज ये घोषणा करता हूं कि मैं आम आदमी पार्टी से दूर जा रहा हूं और जनता के पास जा रहा हूं। राजनीति में आने से पहले मैं सीए था। आज जो लोग आम आदमी पार्टी का दामन छोड़ रहे हैं, अलग हो रहे हैं, उनमें कोई वर्ल्ड क्लास क्रिकेटर रहा, कोई पद्मश्री रहे, कोई सोशल एक्टिविस्ट रहे। ये तमाम लोग अपना सबकुछ छोड़कर करप्शन फ्री इंडिया का संकल्प लेकर आए थे और इस पार्टी को स्थापित किया था। मुझसे बेहतर आम आदमी पार्टी को शायद ही कोई जानता होगा.”
तो साहब सार ये है कि ‘आम आदमी’ की पार्टी अब सिर्फ ‘इंतजार करने वाले’ आदमियों की पार्टी रह गई है। कल तक जो एक-दूसरे को ‘भ्रष्ट’ और ‘तानाशाह’ कहते थे, आज वो ‘देशहित’ के नाम पर एक ही थाली में लड्डू खाएंगे। राजनीति की इस ‘वॉशिंग मशीन’ में दाग तो धुल जाएंगे, लेकिन उन दावों का क्या होगा जो अन्ना हजारे के मंच से किए गए थे ? राघव चड्ढा का ‘सैलाब’ तो आ गया, पर ये सैलाब व्यवस्था को नहीं, बल्कि वफादारी को बहा ले गया। खैर, जनता भी अब समझदार है। वो जानती है कि यहाँ कोई ‘भगत सिंह’ बनने नहीं आया, सब अपनी-अपनी ‘पार्लियामेंट की सीट’ बचाने आए हैं। राजनीति में ‘सिद्धांत’ सिर्फ किताबों में अच्छे लगते हैं, हकीकत में तो सिर्फ ‘समीकरण’ चलते हैं। राघव चड्ढा ने बता दिया है कि जब ‘खामोशी’ टूटती है, तो सिर्फ शोर नहीं होता… पूरा का पूरा राजनीतिक नक्शा ही बदल जाता है। अब देखना ये होगा कि ‘आम आदमी’ के नाम पर बनी इस पार्टी में कितने ‘खास आदमी’ बचते हैं, या फिर झाड़ू सिर्फ दफ्तरों की सफाई तक सीमित रह जाएगी।
“सियासत की बिसात पर मोहरे नहीं, खिलाड़ी बदलते हैं,
कल तक जो खास थे, आज वो पाले बदलते हैं।”
