Assam UCC Bill 2026: शादी, तलाक और Live-in पर बड़ा कानून ! 

Rakesh Sharma - National Head
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असम की राजनीति में आज एक ऐसा कदम उठाया गया है जिसने सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC की बहस को फिर से गर्म कर दिया है। मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की सरकार ने विधानसभा में “यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026” विधेयक पेश कर दिया है। और इस बिल में सिर्फ शादी और तलाक ही नहीं बल्कि Live-in Relationship तक को कानूनी दायरे में लाने की तैयारी दिखाई दे रही है।

अगर यह कानून पास हो जाता है तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा जहाँ UCC लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। लेकिन सवाल है आखिर UCC है क्या? सरकार इसे इतना जरूरी क्यों बता रही है? और सबसे बड़ा सवाल क्या अब Live-in Relationship का भी सरकारी Registration कराना पड़ेगा? आज इस पूरी रिपोर्ट में समझेंगे असम UCC बिल के सबसे बड़े प्रावधान उसकी राजनीति और उससे जुड़ी सबसे बड़ी बहस।

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भारत में अभी विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों के लिए अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग कानून लागू होते हैं। जैसे हिंदू मैरिज एक्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ क्रिश्चियन मैरिज एक्ट यानि हर समुदाय के अपने व्यक्तिगत कानून। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करे। और अब असम सरकार दावा कर रही है कि वो इसी दिशा में ऐतिहासिक कदम उठा रही है। सरकार के मुताबिक यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा और पारिवारिक कानूनों में “समानता” लाएगा। अब समझिए इस बिल के सबसे बड़े प्रावधान।

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सबसे बड़ा फैसला बहुविवाह यानी Polygamy पर पूरी तरह रोक। यानी किसी भी समुदाय में एक से ज्यादा शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। इसके अलावा सभी विवाह और तलाक का Registration अनिवार्य होगा। यानि सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी कर लेना काफी नहीं होगा उसका कानूनी पंजीकरण भी जरूरी होगा। सरकार का कहना है कि इससे महिलाओं और बच्चों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और भविष्य में विवाद होने पर प्रमाण मौजूद रहेगा। लेकिन इस बिल का सबसे चर्चित हिस्सा है Live-in Relationship को कानूनी रूप से परिभाषित करना। जी हां…
पहली बार असम में शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार करने की कोशिश की गई है।

बिल के मुताबिक अगर कोई जोड़ा Live-in Relationship में रहता है तो उसे अपने संबंध का Registration कराना होगा। सरकार का तर्क है कि
आज समाज में ऐसे संबंध बढ़ रहे हैं लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण महिलाएं और बच्चे कई बार असुरक्षित रह जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक साथ रहने के बाद अपने साथी को छोड़ दे तो मौजूदा कानून में पीड़ित पक्ष के लिए न्याय पाना काफी जटिल हो जाता है।

सरकार कह रही है कि अनिवार्य Registration से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और महिलाओं को अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं बिल में यह भी कहा गया है कि Live-in Relationship से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा।

यानि भविष्य में संपत्ति… उत्तराधिकार… और सामाजिक पहचान से जुड़े विवाद कम करने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि अभी तक इस कानून के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं हुए हैं। यानी अभी यह साफ नहीं है कि Registration कितने दिनों में कराना होगा न कराने पर क्या सजा होगी और प्रक्रिया कैसी होगी।

लेकिन इतना तय है कि यह प्रावधान आने वाले समय में सबसे बड़ी बहस बनने वाला है। अब यहां एक और बड़ा पहलू समझना जरूरी है। असम सरकार ने इस बिल में राज्य की जनजातीय आबादी को छूट दी है यानि Scheduled Tribes पर यह कानून लागू नहीं होगा। सरकार का कहना है कि जनजातीय समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है। यानी एक तरफ “समान कानून” की बात और दूसरी तरफ स्थानीय सामाजिक विविधता को भी ध्यान में रखने की कोशिश। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या असम मॉडल उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल से अलग है?

दरअसल उत्तराखंड UCC में भी Live-in Relationship के Registration को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ Registration न कराने पर जुर्माना और जेल तक का प्रावधान रखा गया था। लेकिन बाद में निजता के अधिकार को लेकर कई सवाल उठे। अब असम मॉडल में भी इसी तरह की बहस शुरू हो सकती है। क्या यह कानून महिलाओं को सुरक्षा देगा? या फिर लोगों की निजी जिंदगी में सरकारी दखल बढ़ाएगा? यही आने वाले दिनों की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस बनने वाली है। फिलहाल… असम विधानसभा में इस बिल पर चर्चा और मतदान बाकी है। लेकिन इतना साफ है कि अगर यह विधेयक पास हो जाता है तो UCC को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो जाएगा।

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