Savarkar: वीर या विवादास्पद ? इतिहास के पन्नों का अनकहा सच!

Rakesh Sharma - National Head
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Savarkar: इतिहास हमेशा वो नहीं होता जो किताबों में पढ़ाया जाता है… कभी-कभी असली इतिहास को राजनीति की गहरी परतों के नीचे दफन कर दिया जाता है। एक ऐसा नाम, जिसे भुलाने की हर मुमकिन कोशिश की गई। एक ऐसा क्रांतिकारी, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने काल कोठरी में तो कैद किया, लेकिन उसकी वैचारिक क्रांति को कभी जंजीर नहीं पहना पाई। कल्पना कीजिए, कैसी होगी 50 साल की सजा! दो जन्मों के बराबर कारावास। आखिर क्यों कांपती थी, ब्रिटिश सल्तनत इस एक नाम से, जिसे आज भारत याद कर रहा है।

एक ऐसा ही नाम है — वीर सावरकर। जिसे कुछ ने विवादों में खड़ा किया, तो कुछ ने मिटाने की कोशिश की। लेकिन सच… सच को आप चाहे जितनी बेड़ियों में जकड़ लें, वो एक दिन सामने आ ही जाता है।”

Savarkar: 28 मई 1883, नासिक के पास भागुर में जन्मा एक लड़का, जब लंदन पहुंचा तो अंग्रेजों को लगा कि एक और ‘सूट-बूट’ वाला भारतीय वकील आ गया है। पर उन्हें क्या पता था कि ये वकील, कानून की किताबें पढ़ने नहीं, बल्कि ‘इंपीरियल’ हुकूमत की कब्र खोदने आया है!

उन्होंने ‘अभिनव भारत’ बनाया। जब लोग अंग्रेजों की गुलामी में तालियां बजा रहे थे, तब सावरकर पेरिस में बैठकर, बम बनाने के नुस्खे भारत भेज रहे थे। और वो किताब — ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’। अंग्रेजों ने जिसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहा, सावरकर ने उसे ‘स्वतंत्रता संग्राम’ का नाम देकर, ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी। किताब छपने से पहले ही बैन! सोचिए, एक किताब से इतनी दहशत ? सावरकर सिर्फ एक नाम नहीं, एक खौफ थे!

Savarkar: मार्च 1910। गिरफ्तार सावरकर को पानी के जहाज से भारत लाया जा रहा था। मार्सेल्स के पास जहाज रुका, पहरेदार ऊंघ रहे थे… और फिर वो हुआ, जो किसी हॉलीवुड फिल्म से भी ज्यादा रोमांचक है। सावरकर ने टॉयलेट की खिड़की तोड़ी और छलांग लगा दी समंदर में! उफनती लहरों के बीच, गोलियों की बौछार के बावजूद, वो तैरते हुए फ्रांस की जमीन पर पहुंचे। नियति ने साथ नहीं दिया, फिर पकड़े गए। लेकिन उस रात उन्होंने साबित कर दिया था कि वे शेर हैं, जो पिंजरे के लिए नहीं बने।

अंडमान की सेलुलर जेल। जहां सूरज की किरणें भी, डरकर अंदर आती थीं। 50 साल की सजा का मतलब क्या होता है ? कोल्हू के बैल की तरह तेल पिसवाना, हर दिन कोड़ों की मार, और वो दलदली खाना। अच्छे-अच्छे क्रांतिकारियों का मानसिक संतुलन टूट गया था।

Savarkar: “आज एसी कमरों में बैठकर ‘क्रांति’ पर प्रवचन देने वाले लोग जरा सोचें… जिनके पास कलम नहीं थी, उन्होंने अपने नाखूनों, कोयलों और कीलों से जेल की दीवारों को ही अपनी डायरी बना दिया। हजारों पंक्तियां याद कर लीं। क्या ये कायरता थी ? नहीं, ये ‘अजेय’ होने का प्रमाण था! अंडमान की उस काल कोठरी में, जहां तिल-तिल कर मौत होती थी, सावरकर ने जो सहा, उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। उस यातना के दौर में भी उनका हौसला नहीं टूटा। उन्होंने कहा था — ‘कष्ट ही तो वह चालक शक्ति है जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और आगे बढ़ाती है।’

अब जरा बात उस ‘माफीनामे’ की, जिसे लेकर आज की राजनीति अपनी दुकान चमकाती है। याद कीजिए, किस तरह देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी के युवराज, सावरकर पर ऐसे बयान देते थे।, मानो वीर सावरकर पर उन्होंने एक तरह से पीएचडी ही कर रखी हो।

Savarkar: सावरकर एक बैरिस्टर थे। वो जानते थे कि जेल की कोठरी में सड़कर मरना ‘बलिदान’ नहीं, ‘मूर्खता’ है। शिवाजी महाराज की कूटनीति को अपनाकर उन्होंने जो याचिकाएं लिखीं, उनमें साफ लिखा था — ‘मेरे साथ मेरे साथियों को रिहा करो।’ ये माफी नहीं थी, ये ‘युद्धनीति’ थी। और बाहर आकर उन्होंने क्या किया ? वही जो वो हमेशा से करना चाहते थे — हिंदू समाज को एकजुट करना!

जेल से आने के बाद रत्नागिरी में नजरबंदी। उन्होंने जो किया, उसने समाज के ठेकेदारों की नींद उड़ा दी। छुआछूत के खिलाफ मंदिर बनवाया, जहां हर जाति के लोग साथ खड़े थे। उन्होंने ‘हिंदुत्व’ को सिर्फ एक धर्म नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की एक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक परिभाषा दी।”

Savarkar: 1948। गांधी जी की हत्या के बाद, जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जवानी देश के लिए झोंक दी, उसे एक बुढ़ापे में अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया गया। क्या मिला ? सिर्फ अपमान! लेकिन अदालत ने कहा — ‘सबूत नहीं हैं।’ उन्हें बरी कर दिया गया। लेकिन इतिहास के पन्नों पर आज भी कुछ लोग, उनके चरित्र पर कालिख पोतने की कोशिश करते हैं। क्या यही कृतज्ञता है हमारी ?

26 फरवरी 1966। सावरकर ने बीमारी से हार नहीं मानी। उन्होंने ‘आत्मार्पण’ किया — इच्छा-मृत्यु। उनका मानना था कि जब जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाए, तो शरीर को बोझ नहीं बनाना चाहिए। मौत को भी उन्होंने अपनी शर्तों पर गले लगाया।”

Savarkar: भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सावरकर के विराट व्यक्तित्व को समेटते हुए कहा था —
‘सावरकर कोई व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं। सावरकर कोई चिंगारी नहीं, एक अंगार हैं। सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तर्क और सावरकर माने तलवार!’
अटल जी ने ठीक कहा था, सावरकर का व्यक्तित्व एक ऐसा विस्तार था, जिसे संकुचित करने की कोशिश हर दौर में हुई, पर वे अडिग रहे।

सावरकर का व्यक्तित्व हमेशा से ही भारतीय राजनीति के दो ध्रुवों के बीच एक बड़ा सवाल रहा है। याद कीजिए दिसंबर 2024 का वो ​दिन, जब लोकसभा में संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर चर्चा के दौरान, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने, वीर सावरकर के विचारों का हवाला देते गंभीर टिप्पणी की थी। राहुल गांधी ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान में डॉ. अंबेडकर, महात्मा गांधी और नेहरू के विचार निहित हैं, जबकि सावरकर ने कभी संविधान में भारतीयता की कमी होने का जिक्र किया था। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सावरकर मनुस्मृति के समर्थक थे, जो संविधान के मूल दर्शन के विपरीत है। उन्होंने यहां तक कहा कि — ‘जब आप संविधान को बचाने की बात करते हैं, तो आप अपने नेता सावरकर का मजाक बना रहे हैं, क्योंकि सावरकर ने कहा था कि संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है।'”

Savarkar: अब यहां वैचारिक मतभेद के दो पहलू सामने आते हैं। एक तरफ वे हैं जो सावरकर के ‘हिंदुत्व’ को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानते हैं, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी जैसे नेता हैं, जो सावरकर के विचारों को लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती मानते हैं। राजनीति में यह टकराव आज भी जारी है। क्या सावरकर का ‘भारतीयता’ का नजरिया वास्तव में आधुनिक संविधान से मेल नहीं खाता ? या फिर यह सावरकर के विचारों की गलत व्याख्या है ? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर हर किसी की अपनी राय है।

वीर सावरकर कोई व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं। और विचारों को आप जेल में डाल सकते हैं, उन पर आरोप लगा सकते हैं, पर उन्हें मार नहीं सकते। सवाल यह नहीं है कि उन्हें किस चश्मे से देखा जाए। सवाल यह है कि क्या हम उस भारत की कल्पना कर सकते हैं, जिसे उन्होंने अपनी ‘पितृभूमि’ और ‘पुण्यभूमि’ माना था ?

वीर सावरकर को उन्हीं के शब्दों में दे​​खिए, वे लिखते हैं ——————
“वंश चाहे अखंड हो चाहे न हो, पर मातृभूमि! हमारे उद्देश्य पूरित हों।
प्रज्वलित अग्नि में, माता के बंधन तोड़ने, सूस के लिए अपना सर्वस्व जलाकर, हम कृतार्थं हो गए हैं।”

सावरकर का जीवन एक ऐसा आईना है, जिसमें आप अपने राष्ट्रवाद की परछाईं खुद देख सकते हैं। आप उन्हें नायक कहें या विवादित, लेकिन इतिहास के पन्नों से उनका नाम मिटाना मुमकिन नहीं है। वे थे, हैं, और रहेंगे।

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