Daily Dose: बंगाल का ‘डंडा’ अब किसकी तरफ घूम गया? | अभिषेक बनर्जी पर हमला 

Rakesh Sharma - National Head
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Daily Dose: इतिहास गवाह है… सत्ता की लाठी जब तक अपने हाथ में होती है, तब तक सब ठीक लगता है। लेकिन जैसे ही उस लाठी का रुख दूसरी तरफ घूमता है… तो अचानक लोकतंत्र, संविधान और न्याय की याद आने लगती है। क्या बंगाल में डर का वो अभेद्य किला दरक रहा है, जिसे दशकों से सियासी खाद-पानी देकर सींचा गया? क्या पश्चिम बंगाल की राजनीति उस मुकाम पर आ खड़ी हुई है, जहां ‘बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय?’ ये सवाल आज इसलिए गूंज रहा है क्योंकि ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी… अभिषेक बनर्जी पर हुए एक हमले ने कोलकाता से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है।

Daily Dose: पलटवार और सियासी घमासान

अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हमला हुआ, तो तृणमूल कांग्रेस भड़क उठी। टीएमसी इसे लोकतंत्र की हत्या बता रही है…लेकिन याद ये भी करिएगा की अगर बीजेपी सांसद कंगना रनौत को मारे गए थप्पड के दौरान अगर आपने चुप्पी साधकर उस पर राजनीतिक व्यंग्य बाण कसे है तो वक्त है साहब कभी भी बदल सकता है…उस दौर की आपकी चुप्पी आप ही पर भारी पड रही है….बंगाल के इस घटनाक्रम के बाद जाहिर सी बात है की  बीजेपी को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है,,लेकिन इस बार बीजेपी का पलटवार भी उतना ही तीखा है… बीजेपी ने साफ कह दिया है—’यह कोई लोकतंत्र पर हमला नहीं है, बल्कि यह उस हिंसक राजनीतिक संस्कृति की कड़वी फसल है, जिसे सालों तक बंगाल की धरती पर खुद टीएमसी ने बोया था।’

“जब विपक्षी कार्यकर्ताओं के घर जल रहे थे, जब पंचायत चुनावों में नामांकन तक दाखिल नहीं होने दिए जा रहे थे, जब बमबाजी और हत्याएं राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनती थीं… तब बंगाल में जो पसरा था, वो ‘शांति’ थी या सिर्फ खौफ की एक गहरी ‘खामोशी’?”

चलिए, वक्त के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाते हैं। बंगाल की राजनीति का एक काला सच ये भी रहा है कि यहाँ चुनाव का मतलब सिर्फ मतदान नहीं, बल्कि एक युद्ध क्षेत्र होता था। एक ऐसा दौर… जहां सत्ता के खिलाफ बोलना, मौत को दावत देने जैसा माना जाता था। विरोध को असहमति नहीं, ‘अपराध’ समझा जाता था।

सोचिए… जब मां-माटी-मानुष का नारा देने वाली सरकार सत्ता में आई, तो उम्मीद थी कि वामपंथ के दौर की हिंसा थमेगी। ममता बनर्जी खुद जनआंदोलन की कोख से निकलीं नेता थीं। लेकिन आलोचक और विश्लेषक आज क्या कह रहे हैं? वही आंदोलनकारी राजनीति… धीरे-धीरे ‘सत्ता-केंद्रित और वर्चस्ववादी राजनीति’ में तब्दील हो गई। विरोधियों को कुचलने की इस क्रोनोलॉजी ने विपक्ष को तो दबाया, लेकिन शायद सत्ता ये भूल गई कि जब विपक्ष नहीं बचता… तब खुद जनता खड़ी हो जाती है।

सपेरे और सांप का सियासी सबक

सियासत के गलियारों में एक पुरानी और बेहद कड़वी कहावत है—’सपेरे की मौत अक्सर सांप के काटने से ही होती है।’

अगर आप बरसों तक राजनीतिक हिंसा को सामान्य बनाए रखेंगे… अगर आप अपने कार्यकर्ताओं को यह सिखाएंगे कि जो भी विरोधी है, वो आपका दुश्मन है… और अगर आप लोकतांत्रिक बहस की जगह ‘सड़क की ताकत और डंडे’ को तरजीह देंगे… तो एक न एक दिन वो हिंसक संस्कृति पूरे माहौल को जहरीला बना देगी। आज बंगाल में यही हो रहा है। यहाँ पीड़ित और आरोपी के बीच का अंतर धुंधला पड़ चुका है।

“जनता वर्सेस गुंडागर्दी”

लेकिन इस पूरी क्रोनोलॉजी में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। बीजेपी का दावा है कि उसकी बढ़ती राजनीतिक ताकत ने बंगाल के आम नागरिक को एक ‘सुरक्षा कवच’ और ‘भरोसा’ दिया है। वो भरोसा, जिसके दम पर आज बंगाल का आम आदमी… सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछ रहा है।

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