भोजशाला में शुक्रवार को नमाज़ बंद! SP की खुली चेतावनी से हिला पूरा लिबरल गैंग

Rakesh Sharma - National Head
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तारीख नोट कर लीजिए, क्योंकि आज इतिहास ने अपना पेंडुलम, 180 डिग्री घुमा दिया है! अब तक देश में शुक्रवार का मतलब क्या होता था ? सड़कें ब्लॉक, ट्रैफिक डाइवर्ट, पुलिस के हाथ-पांव फूले हुए और तथाकथित बुद्धिजीवियों का ‘सेक्युलर विलाप’।

लेकिन आज मध्य प्रदेश का धार जिला, कुछ अलग ही नैरेटिव लिख रहा है। आज सालों बाद वो पहला शुक्रवार आया है, जब धार की हवाओं में जुमे की अज़ान नहीं, बल्कि मां वाग्देवी के जयकारे और शंखनाद गूंज रहे हैं! 15 मई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ‘इंसाफ का वो हथौड़ा’ चलाया, जिसने सालों से पाले जा रहे सेक्युलर झूठ के परखच्चे उड़ा दिए। कोर्ट ने दो टूक कह दिया — “नो इफ, नो बट… भोजशाला सिर्फ और सिर्फ मंदिर है!” नतीजा देखना है ? तो उन लोगों के चेहरे देखिए, जो कल तक इतिहास की किताबों पर अपनी मनमर्जी की स्याही पोत रहे थे। आज उनके नैरेटिव को ऐसा ‘डोज़’ मिला है कि सीधे ICU के वेंटिलेटर पर पहुंच गया है।|

और आज बात होगी कि कैसे एक कोर्ट के आदेश ने शुक्रवार का पूरा ‘शेड्यूल’ ही बदल दिया, और क्यों धार के एसपी की एक खुली चेतावनी ने, सोशल मीडिया के ‘लिबरल गैंग’ को तगड़ी मिर्ची लगा दी है।

इतिहास कैसे बदलता है, अगर देखना हो तो मध्य प्रदेश के धार जिले का रुख कर लीजिए। कल तक जिसे ‘विवादित ढांचा’ कहकर, सेक्युलरिज्म की चादर में लपेटा जाता था, आज वहां मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के एक फैसले ने सारी परतें उधेड़ कर रख दी हैं। कोर्ट ने साफ कह दिया — भोजशाला कोई कन्फ्यूजन नहीं है, भोजशाला सीधे-सीधे मंदिर है!

नतीजा ? आज सालों बाद पहला ऐसा शुक्रवार आया, जब वहां जुमे की नमाज़ की अज़ान नहीं, बल्कि मां वाग्देवी के जयकारे गूंजे। शंखनाद हुआ, महाआरती हुई। यानी जो हक, सालों से फाइलों में धूल फांक रहा था, उसे कोर्ट ने एक झटके में ‘इंसाफ का सैनिटाइजर’ लगाकर चमका दिया है। अब तक देश ने शुक्रवार को लेकर, अलग ही नैरेटिव देखा था। शुक्रवार मतलब — सड़कें ब्लॉक, विशेष नमाज और प्रशासन के हाथ-पांव फूले होना। लेकिन इस शुक्रवार, धार की हवाएं कुछ अलग कह रही थीं। आज वहां नमाज की कोई परमिशन नहीं थी। आज वहां हिंदू समुदाय, दिनभर पूजा-अर्चना कर रहा था। और तो और, धार से भाजपा विधायक, नीना वर्मा खुद महिलाओं के साथ बैठकर भजन गा रही थीं। सोचिए, जिन सेक्युलर सूरमाओं को, शुक्रवार को सिर्फ एक ही वर्ग का कॉपीराइट नजर आता था, आज उन्हें ये देखकर थोड़ी ‘एसिडिटी’ तो जरूर हुई होगी।

“जो लोग सालों से इतिहास को ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के सिरप में डुबोकर पिला रहे थे, कोर्ट के इस कड़वे सच के इंजेक्शन ने, उनकी सारी थ्योरी को ICU में पहुंचा दिया है।”

लेकिन, ये ऐतिहासिक दिन यूं ही नहीं आया। साल 2003 का वो भोजशाला आंदोलन याद कीजिए, जब धार की सड़कों पर गोलियां चली थीं और तीन बेकसूर हिंदुओं ने अपनी जान गंवाई थी। जिन्हें सिस्टम ने तब ‘दंगाई’ या ‘आंदोलनकारी’ कहकर पल्ला झाड़ लिया था, आज हिंदू समाज ने उन्हें ‘बलिदानी’ मानकर, उनके परिवारों का पाद-पूजन किया।

ये उन लोगों के गाल पर भी एक जोरदार तमाचा है, जो कहते हैं कि ‘राम मंदिर’ या ‘भोजशाला’, सिर्फ चुनावी स्टंट हैं। साहेब! पूछिए उन परिवारों से, जिन्होंने अपने बेटों को खोया है। आज जब वहां, मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित हुई, तो उनके आंसू बता रहे थे कि उनके अपनों का बलिदान खाली नहीं गया। ये कारसेवकों के संघर्ष की जीत है, जिसे कोर्ट ने अपनी मुहर दी है।

अब जब माहौल इतना बड़ा हो, तो कानून व्यवस्था भी टाइट होनी चाहिए। प्रशासन ने करीब 2 हजार पुलिसवाले तैनात कर दिए। इंटरनेट पर भी नजर है कि कहीं कोई ‘फेसबुकिया शूरवीर’ माहौल न बिगाड़ दे।

लेकिन इस बीच, लाइमलाइट बटोर ले गए धार के SP सचिन शर्मा! साहब खुली जीप में खड़े होकर माइक पर दहाड़ रहे थे। उन्होंने एक खास वर्ग को सीधी चेतावनी दी और कहा — “अब कानून का पालन होगा और विधि का शासन होगा।”

अब इस बयान के बाद सोशल मीडिया दो गुटों में बंट गया है। एक गुट कह रहा है — वाह! सिंघम हो तो ऐसा, जो कानून का राज स्थापित कर रहा है। वहीं दूसरा ‘लिबरल और प्रोग्रेसिव’ गुट, ट्विटर यानि X पर छाती पीट रहा है कि ‘अरे-अरे, पुलिस अधिकारी ऐसे कैसे बोल सकता है ? ये तो डराया जा रहा है!’

भाई साहब, कमाल है! जब तक पुलिस मूकदर्शक बनी रहे, तो आप कहते हैं ‘लॉ एंड ऑर्डर फेल है’। और जब पुलिस का कप्तान, खुली जीप में आकर कह दे कि ‘कानून तोड़ोगे तो बख्शे नहीं जाओगे’, तो आपको मिर्ची लग जाती है ?

एसपी साहब ने तो सिर्फ इतना कहा कि ‘विधि का शासन’ होगा। अब इसमें भी अगर किसी को डर लग रहा है, तो साफ है कि भाई साहब… दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है!
तो लब्बोलुआब यह है कि धार की भोजशाला अब ‘विवादित’ नहीं रही, वह कानूनी तौर पर ‘मां वाग्देवी का मंदिर’ बन चुकी है। इतिहास के जिन पन्नों को जबरन मोड़कर छुपाने की कोशिश की गई थी, कोर्ट के आदेश ने उस पर से धूल हटा दी है।

प्रशासन अलर्ट पर है, सुरक्षा सख्त है, और सबसे बड़ी बात — देश का बहुसंख्यक समाज आज खुश है कि उसे अपनी ही जमीन पर, अपनी ही देवी की पूजा करने के लिए, अब ‘शुक्रवार’ के बीतने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

जो लोग अब भी इस फैसले से आहत हैं, उन्हें हमारी बस एक ही सलाह है — “इतिहास को बदलने की कोशिश तो क्रूर शासकों ने बहुत की थी, लेकिन सच जब अंगड़ाई लेता है, तो अदालतें भी कहती हैं — सत्यमेव जयते!”

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