देश में तारीखों का बड़ा इतिहास है। युगपुरुषों से जुड़े पर्व हों, रीति-रिवाजों और परंपराओं वाले त्यौहार हों, किसी शख्सियत या महापुरुष का जन्मदिवस या जयंती हो… जब वो तारीख कैलेंडर पर आती है, तो उस दिन रस्मी कार्यक्रम रख दिए जाते हैं, सरकारी भाषण होते हैं और औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती हैं। हमें 15 अगस्त यानी आज़ादी की तारीख याद है, हमें महात्मा गांधी की जयंती याद है, और भी कई ऐतिहासिक तारीखें हैं, जो हमारे मानस पटल पर दर्ज हैं और हमें रटी हुई हैं। या यूं कहें कि रटा दी गई हैं। लेकिन आज एक ऐसी तारीख है, जो इन सबसे बिल्कुल अलग है, जुदा है और इस तारीख को याद करने का कारण तो वाकई, अब तक के तमाम ऐतिहासिक कारणों से बिल्कुल अलग है।
यकीन मानिए, यह वो तारीख है, जिसने न सिर्फ भारत को दुनिया के इतिहास में एक नए आत्मसम्मान के साथ दर्ज किया, बल्कि विश्व को भी चौंका दिया। दुनिया के बड़े-बड़े चौधरी, जो कभी भारत को ‘सपेरों का देश’ समझकर वीज़ा देने में नखरे दिखाते थे, आज वो दिल्ली के इस नए ‘पावर सेंटर’ के सामने, अपनी कूटनीति की स्क्रिप्ट बदल रहे हैं। महान शेक्सपियर कह गए थे — “नाम में क्या रखा है ?” शेक्सपियर साहब, माफ कीजिएगा नाम में भले ही कुछ न रखा हो, लेकिन इस देश में जब ‘तारीख’ और ‘नाम’ एक साथ मिलते हैं, तो भूगोल बदल जाता है! और आज उस तारीख पर जो लिखा जा चुका है, उसे पूरी दुनिया चश्मा लगाकर पढ़ने को मजबूर है।
आज की इस स्पेशल ‘डोज’ का फॉर्मूला तैयार हुआ था, आज ही के दिन, लेकिन पूरे 12 साल पहले! आज तारीख है 26-5-26 और आज से ठीक 12 साल पहले, यानी 26 मई 2014 को संसद भवन के प्रांगण में, एक नए सूरज का उदय हुआ था।
याद कीजिएगा इतिहास की वो शाम, जब लुटियन दिल्ली के बड़े-बड़े राजनीतिक तीमारदारों, सत्ता के दलालों और ‘गठबंधन की मजबूरी’ का रोना रोने वाले मठाधीशों के चक्रव्यूह को भेदकर गुजरात से निकला एक राष्ट्रवाद का तूफान, दिल्ली के तख्त पर आकर ठहर गया था। उस शाम एक नारा गूंजा था — “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!” और भारत की समझदार जनता ने दशकों पुराना वो मिथक एक ही झटके में चकनाचूर कर दिया, जिसमें विदेशी थिंक-टैंक और देश के तथाकथित बुद्धिजीवी, छाती कूटकर कहते थे कि — “भारत में अब पूर्ण बहुमत की सरकार आ ही नहीं सकती, यहां त्रिशंकु लोकसभा ही एकमात्र मजबूरी है।”
जनता ने उन तमाम शगुफों को समेटा, रद्दी के भाव बेचा और देश की कमान सौंप दी — नरेन्द्र दामोदार दास मोदी को। भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में कई बड़े स्तंभ हुए हैं। राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी भी एक स्तंभ थे। स्तंभ ही क्यों, वाजपेयी तो नींव भी थे। लेकिन नरेंद्र मोदी ? वो अटल जी से भी अलग हैं। हालांकि, अटल जी की अपनी अलग जगह है, जहां कोई नहीं पहुंच सकता। उनकी तुलना करना बेमानी है और यहां हम तुलना कर भी नहीं रहे हैं। हम तो उस परिवर्तन की बात कर रहे हैं, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने सपने में भी की होगी। अटल जी की राजनीति, गठबंधन की मजबूरियों के बीच कविताओं की पंक्तियों से रास्ता निकालने वाली थी। वहीं, मोदी की राजनीति, ‘दबाव’ की नहीं, ‘दबंगई’ की राजनीति है। जहां फैसले लटके नहीं रहते, बल्कि सीधे लागू होते हैं — चाहे वो धारा 370 हो या दुनिया के मंच पर आंख से आंख मिलाकर बात करना।
यहां एक दिलचस्प बात और है। राजनीति में लोग कुर्सी मिलते ही खुद को ‘भाग्यविधाता’ समझने लगते हैं। लुटियन दिल्ली के बड़े-बड़े साहबों को तो गाड़ी के वीआईपी हूटर की आवाज़ के बिना, नींद नहीं आती थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ? वो अपने आपको न तो प्रधानमंत्री कहते हैं, न ही कोई बड़ा स्तंभ। उनके शब्दकोश में सत्ता का अहंकार नहीं, सेवा का संकल्प है। वह खुद को नेता नहीं, एक ‘कार्यकर्ता’ कहते हैं। और जिस ‘प्रधानमंत्री’ पद के लिए कलयुग में महाभारत मची है, उसे वो बेहद सादगी से ‘प्रधान सेवक’ का पद कहते हैं। यह व्यंग्य है साहब, उन लोगों पर, जो सत्ता को बपौती समझते थे… और यह आई-ओपनर है उन ताकतों के लिए, जो सोचते थे कि भारत, कभी अपनी शर्तों पर जी नहीं सकता।
आज 26 मई 2026 है। पीएम मोदी के नेतृत्व में इस सफर को पूरे 12 साल हो चुके हैं। और विरोधियों की तमाम दुआओं के बावजूद… कारवां बदस्तूर जारी है! डेली डोज में आज, हम देश के उस सबसे बड़े राजनैतिक टर्निंग पॉइंट की बात कर रहे हैं, जिसे समर्थकों ने ‘स्वर्ण काल’ कहा और विरोधियों ने केवल ‘जुमलेबाजी’। लेकिन सच यह है कि इन 12 सालों ने दुनिया के नक्शे पर भारत का ‘लोहा’ मनवा दिया। यह सफर सिर्फ एक सरकार की सालगिरह नहीं है, यह वैश्विक मंच पर मूकदर्शक बने रहने वाले एक देश के ‘सुपरपावर’ बनने की दास्तान है।
फैसले तो सैकड़ों हैं, लेकिन आज हम बात करेंगे उन 12 बड़े और साहसिक फैसलों की, जिन्होंने भारत की राजनीति, भूगोल और इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। चलिए, शुरू करते हैं इन 12 फैसलों का एक्स-रे।
नंबर 1 : अनुच्छेद 370 का दफन (तारीख : 5 अगस्त 2019)
विपक्ष कहता था — “370 को छुआ तो कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी, तिरंगे को कंधा देने वाला कोई नहीं मिलेगा।” मोदी सरकार ने न सिर्फ 370 को उखाड़ फेंका, बल्कि लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटकर तिरंगा ऐसा गाड़ा कि आज वहां, पत्थरबाज़ी की दुकानें बंद हो चुकी हैं और सैलानियों की कतारें लगी हैं। लोकतंत्र का रोना रोने वालों के मुंह पर, यह पहला और सबसे कड़ा तमाचा था।
नंबर 2 : सांस्कृतिक पुनर्जागरण – राम मंदिर निर्माण (22 जनवरी 2024)
दशकों तक कोर्ट के चक्कर काटने वाले और भगवान राम के अस्तित्व पर ही हलफनामा देने वाले राजनेताओं को तब सांप सूंघ गया, जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ। 22 जनवरी 2024 को जब पीएम मोदी ने स्वयं प्राण-प्रतिष्ठा की, तो वह सिर्फ एक मंदिर की शुरुआत नहीं थी, वह भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी वैश्विक हुंकार थी।
नंबर 3 : आतंकवाद पर ‘घर में घुसकर’ प्रहार (सर्जिकल और बालाकोट स्ट्राइक)
पहले की सरकारें आतंकवाद पर कड़े शब्दों में ‘निंदा’ का लेटर लिखती थीं। मोदी सरकार ने नीति बदली — ‘जीरो टॉलरेंस’। उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बाद सीधे पाकिस्तान के बालाकोट में घुसकर एयरस्ट्राइक! दुनिया हैरान रह गई कि ये नया भारत है, जो अब सीमा पर मूकदर्शक बनकर खड़ा नहीं रहता, बल्कि नापाक इरादों का सीधे, ‘विध्वंस’ करता है।
नंबर 4 : महिला आरक्षण कानून – नारी शक्ति वंदन अधिनियम (गंभीर और प्रेरणादायक आवाज़)
दशकों से संसद की फाइलों में धूल फांक रहे इस बिल पर पहले की सरकारों में केवल राजनीति होती थी। मोदी सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण पास करा दिया। अब महिलाएं सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि देश के नीति-निर्धारण की अग्रिम पंक्ति में खड़ी होंगी।
नंबर 5: तीन तलाक से मुक्ति
वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में जिस कुप्रथा को छूने से भी नेता डरते थे, उसे मोदी सरकार ने ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम’ बनाकर अपराध घोषित कर दिया। विरोधियों ने इसे ‘धार्मिक मामलों में दखल’ कहा, लेकिन यह करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को सम्मान से जीने का अधिकार देने वाला विशुद्ध मानवीय फैसला था।
नंबर 6: सेना का आधुनिकीकरण – अग्निपथ योजना
सेना को युवा, चुस्त और तकनीकी रूप से सुपर-एडवांस बनाने के लिए ‘अग्निवीर’ योजना लाई गई। इस पर राजनीति चमकाने की खूब कोशिशें हुईं, देश में भ्रम फैलाया गया, लेकिन आज का युवा जानता है कि राष्ट्र सेवा के साथ-साथ खुद को तकनीकी रूप से मजबूत करने का, इससे बड़ा विजनरी कदम कोई और नहीं हो सकता।
नंबर 7 : नोटबंदी – काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक (8 नवंबर 2016)
याद कीजिए 8 नवंबर 2016 की वो तारीख, जब रात 8 बजे के बाद कई आलीशान बंगलों के गद्दों से निकलने वाले नोट, रद्दी बन गए थे। विपक्ष ने लंबी कतारों का रोना रोया, लेकिन इस एक फैसले ने देश को जो सबसे बड़ा तोहफा दिया — वो था डिजिटल इकोनॉमी का जन्म। कैश के घमंड को तोड़कर, देश को ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की राह पर डाल दिया गया।
नंबर 8: जीएसटी – वन नेशन, वन टैक्स (1 जुलाई 2017)
आजादी के बाद का सबसे बड़ा टैक्स सुधार। इंस्पेक्टर राज और टैक्स की चोरी को खत्म कर, पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया गया। शुरुआती दिक्कतों पर छाती पीटने वाला विपक्ष आज चुप है, क्योंकि हर महीने रिकॉर्ड तोड़ जीएसटी कलेक्शन से ही, देश के हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर चमक रहे हैं।
नंबर 9: डिजिटल इंडिया और जनधन योजना
दुनिया के बड़े देश हैरान हैं कि भारत का एक रेहड़ी-पटरी वाला भी, आज QR कोड से पेमेंट ले रहा है। 50 करोड़ से अधिक जन-धन खाते खोलकर मोदी सरकार ने, भ्रष्टाचार के बिचौलियों को हमेशा के लिए बेरोजगार कर दिया। अब दिल्ली से चला 1 रुपया, सीधे गरीब के खाते में 100 पैसे बनकर पहुंचता है।
नंबर 10 : 10% सवर्ण आरक्षण (EWS)
जातिगत राजनीति के दलदल में फंसे भारत में, मोदी सरकार ने 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) लोगों को 10% आरक्षण देकर सामाजिक न्याय की एक नई और निष्पक्ष परिभाषा लिख दी। बिना किसी विवाद के, सबको साथ लेकर चलने का यह सबसे बड़ा उदाहरण बना।
नंबर 11 : नागरिकता संशोधन कानून (CAA)
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में मजहबी प्रताड़ना झेल रहे गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का यह फैसला, पूरी तरह मानवता को समर्पित था। इस पर शाहीन बाग जैसे प्रायोजित आंदोलन खड़े किए गए, देश को डराने की कोशिश हुई, लेकिन सरकार टस से मस नहीं हुई। क्योंकि यह नया भारत, शरणार्थियों को उनका हक देना जानता है।
नंबर 12 : नई शिक्षा नीति और अंग्रेजों के कानूनों का अंत
34 साल बाद देश को अपनी खुद की ‘नई शिक्षा नीति’ मिली, जो रटने पर नहीं, हुनर पर जोर देती है। और सबसे बड़ा प्रहार — अंग्रेजों के जमाने के IPC, CrPC और एविडेंस एक्ट को कूड़ेदान में फेंककर, ‘भारतीय न्याय संहिता’, यानि BNS लागू की गई। अब देश ब्रिटिश डंडे से नहीं, भारतीय सोच और न्याय व्यवस्था से चलेगा।
कुल मिलाकर, मोदी सरकार के ये 12 साल… सिर्फ फैसलों की लिस्ट नहीं हैं। आलोचक इसे आज भी ‘लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती’ कहकर, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि बिगाड़ने का ठेका लेते हैं। लेकिन वैश्विक मंच पर आज सच्चाई बिल्कुल साफ है — भारत अब मूकदर्शक नहीं है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मंत्र के साथ, दुनिया की समस्याओं का समाधान करने वाला ‘ग्लोबल लीडर’ बन चुका है।
12 साल पहले जब इस शख्स ने संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा टेका था, तब दुनिया के बड़े थिंक-टैंक मुस्कुरा रहे थे। उन्हें लगा था कि लुटियन की इस भूलभुलैया में, गुजरात का यह मुख्यमंत्री खो जाएगा। लेकिन आज 12 साल बाद, दुनिया देख रही है कि खोया कोई और नहीं, बल्कि वो ताकतें हैं, जो भारत को कम आंकती थीं। चाहे रूस-यूक्रेन संकट में अपनी शर्तों पर तेल खरीदना हो, या फिर वैश्विक मंचों पर भारत को ‘फर्स्ट प्रायोरिटी’ बनाना हो — मोदी का भारत, आज ‘नो कॉम्प्रोमाइज’ की नीति पर चलता है। अब भारत आंख झुकाकर नहीं, आंख मिलाकर बात करता है! 26 मई 2014 की वो ऐतिहासिक शाम सिर्फ दिल्ली में एक सरकार बदलने की, या एक पार्टी को सत्ता सौंपने की शाम नहीं थी। वो शाम इस बात की गवाह थी कि अब भारत की तकदीर, और दुनिया की नजरों में भारत की तस्वीर, बदलने वाली है।
12 साल का यह बेमिसाल सफर, चीख-चीखकर दुनिया को एक ही बात समझा रहा है — कि जब देश के नेतृत्व में फौलादी इच्छाशक्ति होती है, तो देश सिर्फ रेंगता या चलता नहीं है, देश दौड़ता है! और ऐसा दौड़ता है कि पूरी दुनिया को अपने पीछे दौड़ने पर, मजबूर कर देता है!
