देश की सीमाओं पर अचानक बढ़ी हलचल और दिल्ली में बनी एक नई ‘हाई लेवल कमेटी’, क्या किसी बड़े राष्ट्रीय एजेंडे की तरफ इशारा कर रही है ? क्या सरकार सिर्फ, सीमा सुरक्षा की समीक्षा कर रही है या फिर यूं माना जाए की अवैध घुसपैठ, जनसंख्या बदलाव और भविष्य की प्रवासन नीति को लेकर भी, कोई बड़ी तैयारी सरकार के जहन में है, जो पूरी तरीके से गोपनीय है। एक तरफ देश में डेमोग्राफिक यानी जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन हुआ है दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह, खुद सीमावर्ती इलाकों का दौरा करने निकल पड़े हैं। एक दो राज्यों का दौरा होता तो शायद बात साधारण हो सकती थी लेकिन गृहमंत्री अमित शाह एक के बाद एक दौरे कर रहे हैं और ये संकेत बहुत कुछ कह रहे हैं और देश में एक बहुत बड़ी हलचल की दस्तक दे रहे हैं।
आज की डोज कड़वी है, देश की सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ी है। और अब, देश की सुरक्षा के लिए ‘इम्युनिटी’ बढ़ाना जरूरी है। दिल्ली में हलचल तेज है। गृह मंत्रालय ने एक ‘हाई लेवल कमेटी’ बना दी है, नाम है — HLCDC (हाई लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंजेज)। अध्यक्ष बने हैं जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर। सरकार कह रही है कि हम तो बस ‘डेटा’ जुटा रहे हैं। साहब, डेटा तो बहुत पहले से था! पर अब सरकार ‘सच्चाई’ का पोस्टमार्टम करना चाहती है। अब तक जन्म-मृत्यु के रजिस्टरों से काम चल रहा था, अब उन्हें पता चला है कि जनाब, आबादी सिर्फ पैदा होने से नहीं बढ़ रही, बल्कि ‘पहुंचने’ से भी बढ़ रही है। बाहर से आए हुए ‘मेहमान’, जो बिना बुलाए आए और सोफे पर कब्जा करके बैठ गए, अब सरकार उन मेहमानों का बायोडाटा मांग रही है। एक तरफ कमेटी कागजों का पेट चीर रही है, दूसरी तरफ ‘चाणक्य’ खुद मैदान-ए-जंग में हैं! गृह मंत्री अमित शाह का राजस्थान से लेकर गुजरात के ‘हरामी नाला’ तक का दौरा।
‘हरामी नाला’ — नाम ही काफी है यह बताने के लिए कि वहां सुरक्षा क्यों चाहिए। वहां के दलदल में जो ‘कीड़े’ पनपते हैं, उन्हें अब साफ करने की तैयारी है। राजस्थान से शुरू हुआ यह मिशन अब त्रिपुरा और बंगाल तक जाएगा। और बंगाल ? अरे, वहां के तो हालात ये हैं कि बिना वीज़ा के लोग ऐसे रह रहे थे जैसे उनके पिताजी—दादाजी की जागीर हो। यहां हम क्या कहना चाह रहे थे, वो शब्द आप अपने हिसाब से फिट कर लेंगे, ऐसा हमे विश्वास है। अब अचानक क्या हुआ ? सत्ता बदली, हवा बदली, और अब वो ‘अवैध मेहमान’ बोरिया-बिस्तर समेट रहे हैं। अब उन्हें लगने लगा है कि ‘पराया देश’ सुरक्षित नहीं है। अरे, पराया तो वो पहले दिन से था, बस आपको अब समझ आया है!
सरकार कह रही है — सब कुछ नॉर्मल प्रोसेस है। बिल्कुल! और हम कल सुबह, चांद पर चाय पीने जा रहे हैं! साफ बात ये है साहब कि यह सिर्फ एक कमेटी नहीं है यह, उस ‘अवैध घुसपैठ’ के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की शुरुआत है। जो लोग अब तक संसाधनों पर डाका डाल रहे थे, उन्हें यह समझ आ चुका है कि अब ‘फ्री लंच’ का टाइम खत्म हो गया है। दिल्ली में बनी यह कमेटी और सीमा पर शाह का यह ‘मिशन’, महज सरकारी फाइल नहीं है। यह एक स्पष्ट चेतावनी है —भारत अब वो धर्मशाला नहीं है जहां कोई भी आए, रुके और अपना अधिकार जताने लगे। क्या यह CAA का प्री-लूड है ? क्या यह नई प्रवासन नीति का ट्रेलर है ? इसका जवाब कमेटी की रिपोर्ट देगी। लेकिन इतना तय है — अब कोई भी परिंदा पर मारेगा, तो पंख कतरने की तकनीक दिल्ली के पास तैयार है। और इस बात को समझने के लिए, जरा इस पूरी तस्वीर को थोड़ा करीब से देखिए — ऐसी एक नहीं, कई तस्वीरें हैं, जो सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर आजकल ‘वायरल’ हो रही है। तस्वीरें डरावनी हैं, लेकिन सच उससे भी ज्यादा गहरा है। पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर के कई सीमावर्ती इलाकों तक, बड़ी संख्या में ऐसे लोग अपना सामान समेटकर वापस लौटते हुए दिखाई दे रहे हैं, जो कल तक यहीं के ‘स्थानीय’ होने का दम भरते थे।
तो साहब, सच ये है कि इन अवैध प्रवासियों का यह अचानक ‘पलायन’ किसी डर का परिणाम नहीं, बल्कि एक ‘नए यथार्थ’ की स्वीकृति है। अब तक एक बहुत बड़ा वर्ग भारत में ऐसे रह रहा था, जैसे यह उनकी अपनी पैतृक जमीन हो। राशन कार्ड से लेकर सरकारी सुविधाओं तक, उन्होंने संसाधनों पर अपना एक ऐसा ‘अघोषित अधिकार’ जमा लिया था, जैसे वे इस देश के नागरिक हों। लेकिन, पिछले कुछ समय में जो ‘सत्ता परिवर्तन’ हुआ है, उसने उस पूरी डेमोग्राफी के ‘कंफर्ट जोन’ को हिलाकर रख दिया है।
फिलहाल, देश की सरहदों पर सन्नाटा नहीं, एक नई गूंज है। और जो लोग अब तक समझते थे कि भारत की जमीन ‘सबकी’ है, उन्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि यह सिर्फ और सिर्फ ‘हमारी’ है। याद रखिए, किसी भी देश की सुरक्षा उसकी ‘सीमाओं’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘सीमाओं के भीतर मौजूद वफादारी’ से तय होती है। सरकार का यह कदम, केवल सीमाओं पर कांटेदार तार लगाना नहीं है, बल्कि यह उन ‘लीकेज’ को बंद करना है, जिनके जरिए भारत के भविष्य को ‘डी-स्टेबलाइज’ करने की कोशिश की जा रही थी।
अब जो भी घुसपैठिया या ‘स्थानीय मददगार’ यह सोच रहे थे कि वे रडार से बच जाएंगे, तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि —अब सैटेलाइट की नजर भी उन पर है और कानून की कलम भी, उनके फैसलों पर। खेल अब रैंडम नहीं, ‘टारगेटेड’ होगा।
