राजस्थान स्वास्थ्य विभाग वेंटिलेटर पर ! | कोटा त्रासदी और संवेदनहीनता की रिपोर्ट

Atul Ahsas
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कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (NMCH) में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद प्रसूताओं की मौत और कई महिलाओं की किडनी फेल होने की घटना ने एक बार फिर राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था की कलई खोल दी है। वैसे हम इसे घटना कम और सरकारी तंत्र द्वारा किया गया मर्डर कहना ज्यादा उचित मानते हैं। सरकार ने जांच दल भेज दिया है….. विशेषज्ञ तैनात किए हैं और ‘कड़ी कार्रवाई’ का आश्वासन दिया है। ये डायलग्स नए नहीं हैं क्योंकि हम हर हादसे के बाद इनको सुनते आए हैं…..लेकिन सवाल वही है जो हर त्रासदी के बाद गूंजता है साहब  —  क्या हमारे देश के मंत्रियों, नौकरशाहों और अस्पताल प्रशासकों की नींद टूटने के लिए, मासूमों की जान और परिवारों की तबाही अनिवार्य शर्त है ?

4 मई से शुरू हुआ यह घटनाक्रम, मानवीय संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण है। एक प्रसूता के परिजनों का आरोप है कि बार-बार शिकायत के बावजूद डॉक्टर्स ने ध्यान नहीं दिया। जब यूरिन आना बंद हुआ, जो कि सीधे तौर पर ‘किडनी फेलियर’ का संकेत था, तब भी स्टाफ इसे सामान्य समझकर टालता रहा।

साहब, रात भर दर्द से कराहती महिला और बिलखते नवजात के प्रति डॉक्टरों का यह ‘इंतजार करो’ वाला रवैया, किसी अपराध से कम नहीं है। अब तक दो माताएं दम तोड़ चुकी हैं और कई, आईसीयू में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही हैं।

सिजेरियन ऑपरेशन के बाद एक के बाद एक प्रसूताओं की बिगड़ती हालत और दो मौतों ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन, साहब हमारा सिस्टम हमेशा किसी त्रासदी के बाद ही क्यों जागता है ?

हमें ये समझ नहीं आता कि आखिर चिक्त्सिा विभाग में निगरानी का अभाव क्यों ?

जब 4 मई को ही प्रसूताओं की हालत बिगड़ने लगी थी, तब अस्पताल प्रशासन ने इसे ‘इमरजेंसी’ क्यों नहीं माना ? क्यों परिजनों की शिकायतों को, यूरिन बैग बदलने और सुबह तक इंतजार करने के नाम पर टाला गया ? हॉस्पिटल्स में रेगुलर ऑडिट कहां है साहब ? किसी भी अस्पताल में, एक साथ कई मरीजों की किडनी फेल होना या संक्रमण फैलना, ‘मेडिकल प्रोटोकॉल’ की विफलता है। क्या अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता और OT के स्टरलाइजेशन की नियमित जांच नहीं होती ?

और साहब, एक और कमाल देखिए….जो हम अक्सर देखते हैं, आज से नहीं, ना जाने कब से…..

मंत्री और उच्चाधिकारी तभी सक्रिय क्यों होते हैं, जब मामला सुर्खियों में आता है या मौतें हो जाती हैं ?

क्या आम आदमी की जान की कीमत सिर्फ एक ‘जांच कमेटी’ और ‘मुआवजे’ तक सीमित है ?

राजस्थान के सरकारी और निजी अस्पतालों से लगातार सामने आ रही हृदयविदारक घटनाएं,

प्रदेश की ‘निशुल्क’ और ‘बेहतर’ स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की पोल खोलती हैं। और प्रदेश में चिकित्सा त्रासदियों का काला इतिहास, इस सच्चाई पर मुहर लगाता है।

कोटा (2019) : जेके लोन अस्पताल में उपकरणों की खराबी (वेंटिलेटर-वार्मर) के कारण एक महीने में 100 से ज्यादा नवजातों की मौत। क्या मासूमों की जान से बढ़कर उपकरणों की मरम्मत है ?

जयपुर (2023) : जेके लोन अस्पताल के आईसीयू में शॉर्ट सर्किट से आग। खिड़कियां तोड़कर 47 बच्चों को बचाना पड़ा।

क्या अस्पतालों का फायर ऑडिट, सिर्फ कागजों तक सीमित है ?

अक्टूबर 2025 : प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस (SMS) ट्रॉमा सेंटर में आग लगने से 8 मरीजों की दर्दनाक मौत।

क्या प्रदेश का मुख्य अस्पताल ही मरीजों के लिए सुरक्षित नहीं है ?

ब्लड ट्रांसफ्यूजन ब्लंडर : 2024 में एक मरीज को गलत ब्लड ग्रुप चढ़ा दिया गया…. 2025 में एक गर्भवती महिला के साथ भी यही लापरवाही की गई। गलत ब्लड ग्रुप चढ़ाने से दोनों की मौत हो गई।

विधानसभा में सरकार ने माना कि 2023 से 2025 के बीच केवल ‘लापरवाही’ से 12 मौतें हुईं।

तो साहब, सिर्फ मानने भर से चिकित्सा सुविधाएं ठीक या उच्च स्तर की हो जाएंगी ?

निजी अस्पतालों की लापरवाही के मामले भी सामने आते रहे हैं।

जोधपुर (2025) : 13 साल के खिलाड़ी को गलत ब्लड चढ़ाया गया, किस्मत से जान बची।

उदयपुर में बिना स्कैन सर्जरी से ब्रेन हेमरेज, ब्यावर में पेट में पट्टी छोड़ने जैसे संगीन मामले।

उपभोक्ता आयोग ने लाखों का जुर्माना तो लगाया, लेकिन क्या उनके लाइसेंस रद्द हुए ?

बीते अप्रैल महीने में, जयपुर के बजाज नगर थाना इलाके में एक निजी अस्पताल का मामला देखिए, जहां एक लड़की की बाईं की जगह दाईं आंख का ऑपरेशन कर​ दिया गया।

अप्रैल महीने में ही जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में एक बुजुर्ग महिला के बाएं पैर की जगह दाएं पैर की सर्जरी कर दी गई।

ये क्या है साहब ? हैल्थ सर्विसेज में लापरवाही का मतलब समझते हैं आप ??  जान पर बन आना,,,, जान से खिलवाड़………

किसी बैलेंस शीट में गलती है, एडजेस्ट किया जा सकता…. सरकारी रजिस्टर में त्रुटियां हों, ठीक की जा सकती हैं लेकिन इलाज गलत हो गया या लापरवाही बरती जाती है, जो उसका भुगतान मरीज और उसके परिजनों को ही करना पड़ता है ?

सरकार और विभाग तो बस डॉयलाग डिलेवरी देंगे ————— जांच बिठा दी है, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी……

ये वो दो डॉयलाग्स हैं, जो हर लापरवाही के बाद हमें सुनने और पढ़ने को मिलते हैं ? मजाल है कि इन डॉयलाग्स में कोई अंतर आ जाए।

क्या सरकार से सीधे सवाल नहीं पछे जाने चाहिए ———— जब जांच कमेटियां उपकरणों की खराबी को, मौत का कारण मानती हैं, तो समय पर बजट और ऑडिट क्यों नहीं होता ?

क्या केवल जांच कमेटी बनाना ही समाधान है ? कितने दोषी अधिकारियों या डॉक्टर्स को अब तक बर्खास्त किया गया ? क्या सरकार और संबंधित विभाग, हर साल एक रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने पेश कर सकेगी ? ब्लड ग्रुप की जांच में बार-बार मानवीय चूक के लिए कौन जिम्मेदार है ?  एक सवाल, फायर सेफ्टी को लेकर भी पूछने का मन कर रहा है : अस्पतालों के पुराने डक्ट और शॉर्ट सर्किट की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे ? क्योंकि अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं भी समय—समय पर आती रही हैं। कुल मिलाकर, यह केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ढर्रे की विफलता है,

जहां बचाव से ज्यादा, ‘डैमेज कंट्रोल’ पर जोर दिया जाता है। नवजात शिशु अस्पताल के गलियारों में बिलख रहे हैं और उनकी माताएं आईसीयू में, जीवन-मृत्यु से जूझ रही हैं।

यदि सरकार वास्तव में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को प्राथमिकता मानती है, तो उसे प्रतिक्रियात्मक राजनीति, यानि Reactive Politics से बाहर निकलकर, एक जवाबदेह स्वास्थ्य तंत्र बनाना होगा।

यकीन मानिए, जनता पक चुकी है ये सुन—सुनकर कि ——— कमेटी बना दी है, जांच हो रही है, सरकार एक्शन ले रही है ???????? 

कोटा की यह हृदयविदारक घटना कोई ‘इत्तेफाक’ नहीं, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम का ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ है, जहाँ संवेदनशीलता दम तोड़ चुकी है। जब अस्पताल के गलियारों में सिसकती मांओं की चीखें साहबों के बंद कमरों तक नहीं पहुँचतीं, तो समझ लेना चाहिए कि हमारा ‘स्वास्थ्य तंत्र’, वेंटिलेटर पर है।

निशुल्क दवाओं और जांचों के बड़े-बड़े विज्ञापनों से अखबार रंगे जा सकते हैं, लेकिन उन बिस्तरों का खालीपन नहीं भरा जा सकता, जहां कल एक मुस्कुराती हुई मां थी।

मरीज अस्पताल जान बचाने आता है, अपनी अर्थी सजवाने नहीं। अगर तंत्र मासूमों की चीखों से नहीं जाग पा रहा, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था का ‘ब्रेन डेड’ हो चुका है। अब वक्त कमेटियां बिठाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही की उस ‘अग्निपरीक्षा’ का है, जिसमें दोषी अधिकारी और प्रशासन जलकर राख हों, न कि मासूम जनता के अरमान।

साहब, व्यवस्था को अब ‘बैंड-एड’ की नहीं, एक ‘मेजर ऑपरेशन’ की जरूरत है! यकिन मानिए, ऐसा हुआ तो व्यवस्थाएं बदल जाएंगी। वर्ना और कुछ बदले ना बदले, वो चीज तो बदल ही जाएगी, जो पांच साल में एक बार बदलती है।

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