मौन या मजबूरी ? क्या विजय डर गए ? उदयनिधि के बयान पर थलपति का चौंकाने वाला रुख…

Atul Ahsas
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आज मन व्यथित है…..लोकतंत्र के मंदिर यानी तमिलनाडु विधानसभा में जो हुआ, वह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि 100 करोड़ सनातनी हिंदुओं की आस्था का ‘चीरहरण’ था! उदयनिधि स्टालिन ने फिर वही ज़हर उगला…सवाल ये नहीं कि स्टालिन ने जहर क्यों उगला ?? उससे भी बड़ा सवाल उस ‘मौन’ पर है, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है। थलपति विजय, जो खुद को जनता का रक्षक कहते हैं, वह सदन में हाथ बांधकर सुनते रहे, जब उनके बगल में बैठा एक नेता, आपके धर्म को ‘मिटाने’ की कसम खा रहा था। क्या यह चुप्पी आने वाले विनाश की आहट है ? हमसे पूछेंगे तो जवाब मिलेगा — ये आने वाले विनाश की नहीं, तूफान की आहट है।

सुनो तमिलनाडु! सुनो भारत! यह वही ‘सनातन’ है, जिसे मिटाने का सपना मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक ने देखा, लेकिन वो खुद मिट्टी में मिल गए। आज उदयनिधि स्टालिन ने फिर वही हुंकार भरी — ‘सनातन का समूल नाश होना चाहिए।’

स्टालिन और उनकी पार्टी को तो जनता ने जवाब दे दिया साहब………लेकिन थलपति विजय जी, आपसे सवाल है! क्या राजनीति इतनी बड़ी हो गई कि आपके सामने, आपके पूर्वजों की संस्कृति को ‘डेंगू और मलेरिया’ कहा गया और आप मुस्कुराते रहे ? क्या विधानसभा की वो कुर्सी इतनी भारी है कि सनातन के अपमान पर, आपकी ज़ुबान को लकवा मार गया ? याद रखिए, जिस सेंगोल और जिस धर्म को ये लोग मिटाना चाहते हैं, वही इस देश की पहचान है।

सनातिनयों के खिलाफ यह नफरत सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। याद करिए विपक्षी गठबंधन के वो चेहरे — बिहार में कोई रामचरितमानस को ‘पोटेशियम साइनाइड’ कहता है।  उत्तर प्रदेश में कोई पवित्र ग्रंथों की प्रतियां जलाता है। पश्चिम बंगाल में रामनवमी की शोभायात्राओं पर पत्थर बरसते हैं।

ये सब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनका एजेंडा साफ है — हिंदुओं को बांटो और सनातन को गाली दो। लेकिन उदयनिधि ये भूल रहे हैं कि असम (करीब 1.9 करोड़ हिंदू), बंगाल (करीब 6.4 करोड़ हिंदू) और खुद तमिलनाडु (करीब 6.3 करोड़ हिंदू) के सनातनी अब जाग चुके हैं।

उदयनिधि को शायद इन आंकड़ों की ताकत का अंदाजा नहीं है। जिस तमिलनाडु में वो सनातन को खत्म करने की बात करते हैं, वहां की 87% से ज्यादा आबादी भगवान शिव और विष्णु की उपासक है। उदयनिधि कहते हैं कि वे ‘समानता’ के लिए सनातन को मिटाना चाहते हैं। गजब का तर्क है साहब! जिस धर्म ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) का नारा दिया, उसे आप विभाजनकारी कह रहे हैं ?

अरे! विभाजनकारी तो वो ‘द्रविड़ियन राजनीति’ है, जो उत्तर और दक्षिण को बांटती है। विभाजनकारी तो वो मानसिकता है, जो दीपावली पर अंधेरा चाहती है और ‘कार्तिकेय दीपम’ का विरोध करती है।

और विजय जी, सी जोसेफ विजय जी, तमिलनाडु की जनता ने आपको ‘मुख्यमंत्री’ बनाया है, ‘मूकदर्शक’ नहीं। अगर आज आप नहीं बोले, तो इतिहास लिखेगा कि जब सनातन पर प्रहार हो रहा था, तब थलपति सिर्फ अपनी कुर्सी बचा रहे थे।

क्या आप जानते हैं ? तमिलनाडु के 38,000 से ज्यादा मंदिर, दुनिया की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत हैं। मदुरै मीनाक्षी मंदिर और चिदंबरम नटराज मंदिर के गोपुरम और वास्तुकला अद्भुत हैं। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, गंगैकोंडचोलपुरम और ऐरावतेश्वर मंदिर यूनेस्को की सूची में शामिल हैं।

जिस ‘गोपुरम’ को आप अपने सरकारी लेटरहेड पर छापते हैं, वो उसी सनातन का प्रतीक है जिसे आप मिटाना चाहते हैं।

2026 में 59 सीटों पर सिमटने वाली DMK को समझना होगा कि ‘जनता जनार्दन’ होती है, और जनार्दन (भगवान) का अपमान करने वालों का हश्र क्या होता है।

यह खबर नहीं, एक चेतावनी है। उन लोगों के लिए, जो सोचते हैं कि सहिष्णुता हमारी कमजोरी है। उदयनिधि का बयान उनकी हार की हताशा है, लेकिन विजय की चुप्पी, एक गहरा घाव है।

उदयनिधि स्टालिन का बयान महज़ एक राजनैतिक भाषण नहीं है, यह उस 87% आबादी के वजूद पर हमला है, जिसने इस राज्य को अपनी पसीने और प्रार्थनाओं से सींचा है।

तमिलनाडु की जनता देख रही है — कौन साथ खड़ा है और कौन हाथ बांधकर तमाशा देख रहा है।

क्या आप अपनी विरासत को ‘डेंगू’ कहने वालों के साथ खड़े होंगे, या उस शाश्वत सत्य के साथ, जो सदियों से इस देश का कवच रहा है ? याद रखिएगा, आज अगर आप चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां आपसे सवाल जरूर पूछेंगी।

तमिलनाडु के 38,000 मंदिरों की घंटियां आज एक सवाल पूछ रही हैं — क्या लोकतंत्र के मंदिर में अब केवल आस्था की बलि चढ़ेगी ? जिस धर्म ने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का मंत्र दिया, उसे विभाजनकारी कहना, हार की बौखलाहट है या सोची-समझी साज़िश ?

फैसला अब तमिलनाडु की उस 87% जनता को करना है, जिसकी रगों में सनातन बसता है।

सनातन सत्य था, सत्य है और सत्य रहेगा। मिटाने वाले आए और चले गए!

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