जयपुर की सियासत में इन दिनों एक नाम फुसफुसाहट से निकलकर सुर्खियों की दहलीज़ पर आ खड़ा हुआ है, नाम है प्रमोद शर्मा। कभी ‘सत्ता के गलियारों का शॉर्टकट’ माने जाने वाले इस चेहरे की कहानी, अब “कानून के चौराहे” पर आकर अटक गई है। राजनीति में ‘किंगमेकर’ कहलाने की चाहत रखने वाले कई चेहरे आए और गए, लेकिन प्रमोद शर्मा का किस्सा कुछ अलग है। इसे आप ‘सियासत का शॉर्टकट’ कहिए या ‘सिस्टम की सेंधमारी’।
सवाल ये नहीं है कि प्रमोद शर्मा कहाँ हैं?? सवाल ये है कि उन्हें ढूँढने वाली पुलिस की रफ्तार इतनी ‘कछुआ छाप’ क्यों है? क्या कानून के हाथ वाकई लंबे हैं, या उन हाथों ने किसी रसूखदार की ‘आस्तीन’ पकड़ रखी है?
आज बात होगी — सत्ता के उस अदृश्य दरबार की, जिसका सवेरा रसूख से होता था और रात फाइलों के खेल से।” कहानी में ट्विस्ट कम नहीं हैं। एक तरफ पुलिस है, जो नोटिस पर नोटिस थमा रही है, पहला, दूसरा, और अब तीसरे की तैयारी। जयपुर पुलिस के ये नोटिस अब, किसी ‘वेब सीरीज’ के एपिसोड जैसे लगने लगे हैं, जहां क्लाइमेक्स आने से पहले ही, ‘विज्ञापन’ आ जाता है। या मानो कोई सरकारी सीरियल चल रहा हो, जिसमें “अगले एपिसोड में गिरफ्तारी” का प्रोमो, बार-बार आता है, लेकिन क्लाइमेक्स टलता जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां TRP नहीं, कानून की साख दांव पर है।
दूसरी तरफ बचाव पक्ष है, जो “प्राकृतिक न्याय” की ढाल लेकर खड़ा है। उनका कहना है — 16 को नोटिस देकर 17 की सुबह हाजिरी मांगना, ये न्याय नहीं, जल्दबाज़ी है। वैसे देखा जाए तो बात सही भी लगती है लेकिन साहब, यहां सवाल ये भी है कि जो शख्स महीनों से “अंडरग्राउंड मोड” में है, उसे अब समय की कमी का दर्द अचानक क्यों और कैसे महसूस होने लगा ?
इधर सूत्रों की मानें तो कहानी में आध्यात्मिक एंगल भी जुड़ गया है। आश्रम, संत, तस्वीरें, और सियासत का पुराना फॉर्मूला — “जब मुश्किल बढ़े, तो आध्यात्म का रास्ता पकड़ लो।” खबरें हैं कि ‘साहेब’ आजकल किसी आश्रम में तपस्या कर रहे हैं। लेकिन जनता पूछ रही है कि यह ‘आध्यात्मिक शांति’ की तलाश है या ‘कानूनी तूफ़ान’ से बचने का वाटरप्रूफ रेनकोट? जनता पूछ रही है कि ये तपस्या है या रणनीतिक पैंतरा?
साहब, सियासत का पुराना फॉर्मूला है — जब फाइलें काटने को दौड़ें, तो झोला उठाकर ‘शरणं गच्छामि’ हो जाओ। 16 तारीख को नोटिस और 17 की सुबह हाजिरी ; बचाव पक्ष इसे ‘जल्दबाज़ी’ कह रहा है। पर साहब, जो महीनों से ‘अंडरग्राउंड’ मोड में हो, उसे 24 घंटे की मोहलत कम लगती है, यह तर्क गले नहीं उतरता। दरअसल, यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक व्यक्ति की तलाश नहीं है, बल्कि उस “अदृश्य सत्ता” का पोस्टमॉर्टम है, जो बिना किसी संवैधानिक पद के भी, सिस्टम पर हावी हो जाती है।
प्रमोद शर्मा का उदय भी कुछ ऐसा ही था। रिश्तों के सहारे रसूख, और रसूख के सहारे सिस्टम पर पकड़। टिकट दिलवाने से लेकर पोस्टिंग करवाने तक, एक अनौपचारिक दरबार सज गया था, जहां फाइलों से ज्यादा “पहचान” चलती थी। लेकिन अब वही सिस्टम करवट ले रहा है। जिन दरवाजों पर कभी लाइनें लगती थीं, वहां अब ताले लटक रहे हैं। जिन अधिकारियों के ट्रांसफर “इशारों” पर होते थे, आज वही अधिकारी दूर-दराज़ इलाकों में भेजे जा रहे हैं और जिन कारोबारों में कभी चमक थी, वहां अब जांच एजेंसियों की नजरें गड़ी हैं।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि यह लड़ाई, अब सिर्फ “गिरफ्तारी बनाम बचाव” नहीं रह गई है। यह एक बड़ी बहस बन चुकी है कि क्या कानून का शिकंजा, सच में सबके लिए बराबर है या फिर कुछ रिश्ते उसे ढीला कर देते हैं ?
“सत्ता का राज हमेशा स्थायी नहीं होता, लेकिन सिस्टम की साख स्थायी होनी चाहिए। अगर तीसरे नोटिस के बाद भी कानून का शिकंजा ढीला रहता है, तो यह मान लिया जाएगा कि राजस्थान में ‘रिश्तों का रसूख’, संविधान की किताबों से ज्यादा भारी है। क्या जयपुर की पुलिस, ‘कुर्की और उद्घोषणा’ तक जाने का साहस दिखाएगी? या फिर ‘आश्रम की शांति’, कानून के इस शोर को दबा देगी ?
“किस्सा दिलचस्प है… कल तक जो शख्स ‘सिस्टम’ हुआ करता था, आज वही शख्स सिस्टम से भाग रहा है लेकिन असल सवाल प्रमोद शर्मा की फरारी का नहीं है, सवाल उस ‘सत्ता के राज’ का है, जो ऐसे किरदार पैदा करता है। अजीब विडंबना है साहब — आम आदमी के लिए कानून ‘बुलेट ट्रेन’ की रफ्तार से चलता है, लेकिन जब बात सफेदपोश रसूख की आती है, तो वही कानून, ‘पैसेंजर ट्रेन’ बनकर हर स्टेशन पर रुकने लगता है।
आश्रम की दीवारें कितनी भी ऊंची क्यों न हों, जनता की नजरों से ऊंची नहीं हो सकतीं। क्या पुलिस का तीसरा नोटिस सिर्फ एक ‘कागजी रस्म’ बनकर रह जाएगा, या जयपुर का प्रशासन यह साबित करेगा कि न्याय की तराजू पर, रिश्तों का वजन शून्य होता है ?
अगर इस बार भी ‘अदृश्य हाथों’ ने कानून की रस्सी ढीली छोड़ दी, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के इस खेल में, नियम आज भी केवल आम जनता के लिए हैं, खास के लिए तो सिर्फ ‘सुविधाएं’ हैं। सियासत के इस खेल में जब किरदार ‘आश्रम’ की शरण लेते हैं, तो समझ जाइए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
साहब, हम समझते हैं कि पुलिस विभाग का काम आसान नहीं है? पुलिसकर्मियों का दर्द शब्दों में बयां नहीं हो सकता स्टॉफ की कमी, ड्यूटी का समय तय न होना, अचानक वीआईपी मूवमेंट में ड्यूटी लगने का आदेश आ जाना, निर्धारित ड्यूटी समय से ज्यादा की सेवाएं देना वे कितनी विषम परिस्थितियों में काम करते हैं, ये आप सोच भी नहीं सकते। साहब, एक हकीकत बताएं आपको, उनके लिए परिवार नाम की कोई चीज नहीं है। ये सच है और इसी सच के साथ वे ड्यूटी करते हैं जिस तरह सीमा पर रक्षा कर रहे सैनिक के लिए हमारे मन में गर्व के भाव आते हैं, उसी तरह पुलिस के जवान के लिए हमें वैसा भाव रखना चाहिए पुलिस के हर जवान को, हर अधिकारी को, हमारा सलाम है। हमें उम्मीद है, जनता को उम्मीद है कि वर्दी अपना फर्ज जरूर निभाएगी।
“हवाओं ने भी रुख बदल लिया है शहर-ए-जयपुर का,
अब इंसाफ के तराजू में, ‘वजन’ भी रसूख का देखा जाता है।”
अब देखना ये है कि क्या प्रशासन में इतनी हिम्मत बची है कि वो इस ‘लकवे’ का इलाज कर सके, या फिर प्रमोद शर्मा प्रकरण महज़ एक और फाइल बनकर धूल फांकेगा ?
सवाल हमारा नहीं, इस लोकतंत्र की साख का है।
