अलविदा Bashir Badr | वो शायर जिसने आम आदमी को आवाज़ दी | RIP

Rakesh Sharma - National Head
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Bashir Badr: ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी…यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।’ ये शेर तो आप सबने कभी ना कभी सुना ही होगा। इस मशहूर शेर जैसे और भी शेर लिखने वाले बशीर बद्र का गुरुवार की दोपहर को 91 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। खबरों की माने तो वो लंबे वक्त से डिमेंशिया के शिकार थे।

जावेद अख्तर ने दिग्गज शायर के निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने X पर लिखा, “आज हमारी उर्दू भाषा थोड़ी गरीब हो गई है। बेहद मधुर कवि बशीर बद्र हमेशा के लिए हमारे बीच से चले गए हैं। वह शायर और उनके शेर हमारी यादों में हमेशा जीवित रहेंगे।”

Bashir Badr
Image: India TV

इस अवसर द न्यूज कैनवास की ओर से शायर के लिए एक खत…

अलविदा Bashir Badr….
आम आदमी के दर्द, मोहब्बत और तजुर्बों का शायर चला गया
कुछ शायर किताबों में रहते हैं, और कुछ लोगों की ज़िंदगी में।
बशीर बद्र उन शायरों में थे जिनके शेर सिर्फ़ महफ़िलों में नहीं, बल्कि आम आदमी की रोज़मर्रा की जिंदगी में सांस लेते थे।
उनकी शायरी में मोहब्बत भी थी, तन्हाई भी, रिश्तों की टूटन भी थी और इंसानियत की आख़िरी उम्मीद भी।
आज जब बशीर बद्र इस दुनिया से रुख़्सत हुए हैं, तो ऐसा लग रहा है जैसे शहर की भीड़ में कोई अपना चेहरा खो गया हो।

ज़िंदगी की अनिश्चितता और इंसान की मुसाफ़िरी को उन्होंने कितनी सादगी से बयान किया था..
“न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए,
मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी”

यह शेर सिर्फ़ दो लोगों की बात नहीं करता, बल्कि पूरी इंसानी जिंदगी का सच है।
हर आदमी अपनी मंज़िल की तलाश में भटक रहा है, लेकिन किसी को नहीं पता कि सफ़र कहाँ खत्म होगा।

आज के समाज में रिश्ते जितने तेज़ी से बनते हैं, उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं।
बशीर बद्र ने बदलते शहरों और बदलते लोगों की फितरत को बहुत पहले पहचान लिया था,
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

इस एक शेर में आधुनिक समाज की पूरी दूरी, बनावट और अकेलापन समाया हुआ है।
लोग पास होकर भी दूर हैं।

उन्होंने इंसान की अंधभक्ति और आत्मसमर्पण पर भी तीखा कटाक्ष किया,
“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।”

यह सिर्फ़ मोहब्बत का शेर नहीं, बल्कि समाज और सत्ता दोनों पर टिप्पणी है।
जब इंसान सवाल करना छोड़ देता है, तब पत्थर भी भगवान बन जाते हैं।

बशीर बद्र रिश्तों में नफ़रत नहीं, इंसानियत बचाए रखने की बात करते थे,
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

आज के ज़हरीले राजनीतिक और सामाजिक माहौल में यह शेर किसी नसीहत से कम नहीं।
मतभेद हों, लेकिन दिलों के दरवाज़े हमेशा बंद नहीं होने चाहिए।

मध्यमवर्गीय आदमी की घुटन, उसकी छोटी-सी जिंदगी और सीमित सपनों को उन्होंने यूँ बयान किया,
“ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।”

यह शेर सिर्फ़ मकानों की तंगी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की कहानी है जहाँ आम आदमी की इच्छाओं के लिए जगह लगातार छोटी होती जा रही है।

मोहब्बत को उन्होंने बाज़ार नहीं बनने दिया। उनकी नज़रों में सच्चा चाहने वाला मिलना सबसे कठिन था,
“अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।”

यही वजह है कि उनके शेर हर टूटे दिल वाले इंसान को अपना लगता है।

यादों और रिश्तों की गर्माहट को बचाए रखने की गुज़ारिश भी उन्होंने कितनी खूबसूरती से की,
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

यह शेर सुनकर लगता है जैसे कोई बुज़ुर्ग जिंदगी का आख़िरी सच समझा रहा हो, कि अंत में इंसान के पास सिर्फ़ यादें बचती हैं।

उन्होंने इंसान और पत्थर के फर्क को भी बड़ी गहराई से समझाया,
“हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं,
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में।”

आज जब संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं, यह शेर और ज़्यादा सच्चा लगता है।

बशीर बद्र उम्मीद के शायर भी थे।
वे तक़दीर को आख़िरी सच नहीं मानते थे,
“कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा,
मुझे मालूम है किस्मत का लिखा भी बदलता है।”

उनकी शायरी आम आदमी को हार मानने नहीं देती थी।
और शायद समाज पर उनका सबसे बड़ा तंज यही था,
“घरों पर नाम थे और नामों के साथ ओहदे भी थे,
बहुत तलाश करने पर भी कोई आदमी नहीं मिला।”

Bashir Badr: जीवन परिचय

बशीर का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अपनी BA, MA, और Ph.D अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की। यहीं से उन्होंने अपने शिक्षण करियर की शुरुआत इसी विश्वविद्यालय से की और बाद में लगभग 17 वर्षों तक मेरठ कॉलेज में लेक्चरर और उर्दू विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया।

Bashir Badr ने 7 साल की आयु में कविता लिखना शुरू किया और उर्दू ग़ज़ल के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक बन गए। अपनी सरल लेकिन भावपूर्ण लेखन शैली के लिए जाने जाने वाले, उन्होंने उर्दू कविता को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया। वे उर्दू, फ़ारसी, हिंदी और अंग्रेजी में धाराप्रवाह थे।

इन वर्षों में उन्होंने कई काव्य संग्रह लिखे, जिनमें इकई, इमेज, आमद, आहट, आस और कुल्लियाते बशीर बद्र शामिल हैं। उन्होंने साहित्यिक आलोचना की पुस्तकें भी लिखीं, जैसे आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़लों का तनक़ीदी मुताला और बिस्विन सदी में ग़ज़ल, जिन्हें उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण कृतियाँ माना जाता है।

पद्म श्री से सम्मानित

अपने करियर के दौरान, Bashir Badr को पद्म श्री सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा कई बार सम्मानित किया गया और बिहार उर्दू अकादमी से भी मान्यता मिली। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, उन्हें मीर अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और न्यूयॉर्क में उन्हें “वर्ष 1980 का कवि” घोषित किया गया।

Bashir Badr: साहित्यिक सफलता के बावजूद, उनका जीवन कठिनाइयों से भरा रहा। एक भीषण आग में उनकी सारी संपत्ति और साहित्यिक रचनाएँ नष्ट हो गईं। इस घटना के बाद, वे भोपाल चले गए और वहाँ उन्होंने अपना जीवन और करियर फिर से संवारा। इस त्रासदी ने उनकी कविता पर गहरा प्रभाव डाला और उनके लेखन में भावनात्मक गहराई का संचार किया।

डॉ राहत से निकाह

Bashir Badr ने डॉ राहत से निकाह किया जिनसे उनकी मुलाकात भोपाल में हुई। उनके कठिन दौर में राहत उनके साथ हर समय मौजूद रहीं। इसलिए कई बार बशीर कहा करते थे “खुदा ने मुझे गजलों का एक खूबसूरत शहर बख्शा है, और मैं इस पूरी सल्तनत को मोहब्बत के नाम करता हूं।”

आज की दुनिया में पहचानें बहुत हैं, इंसान कम हैं।
Bashir Badr इसी खोती हुई इंसानियत के आख़िरी बड़े शायर थे। Bashir Badr चले गए, लेकिन उनके शेर अब भी हर उस आदमी के साथ चलेंगे जो भीड़ में अकेला है, जो मोहब्बत में टूटा है, जो रिश्तों को बचाना चाहता है, और जो इस दुनिया में इंसान तलाश रहा है।

अलविदा बशीर बद्र, आप सिर्फ़ शायर नहीं थे, हमारी जिंदगी की आवाज़ थे।

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