आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पत्रकारिता केवल 200 साल पुरानी नहीं है? क्या भारत की सभ्यता में पत्रकारिता का कोई बीज पहले से मौजूद था? क्या महाभारत के संजय, रामायण के हनुमान और देवर्षि नारद को आधुनिक पत्रकारिता की दृष्टि से देखा जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल… जब दुनिया में इंटरनेट नहीं था… कैमरे नहीं थे… न्यूज चैनल नहीं थे…तब सूचना का धर्म क्या था? और आज पत्रकारिता का धर्म क्या है? आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हम बात करेंगे हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की… उसकी गौरवशाली विरासत की… उसकी चुनौतियों की… और उस पत्रकारिता धर्म की, जिसकी झलक हमें महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी दिखाई देती है।
30 मई 1826। कोलकाता से एक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। नाम था — उदन्त मार्तण्ड। संस्थापक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल। उस दौर में अंग्रेजी और फारसी का दबदबा था। हिंदी भाषी जनता के लिए अपनी भाषा में समाचार उपलब्ध कराना एक क्रांतिकारी कदम था। उदन्त मार्तण्ड केवल समाचार पत्र नहीं था। वह एक विचार था। एक ऐसी आवाज़ जो कह रही थी कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान का आधार भी है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह अखबार लगभग डेढ़ साल बाद बंद हो गया। लेकिन उसने जो चिंगारी जलाई… वह आज करोड़ों हिंदी भाषियों तक पहुंच चुकी है। यदि पत्रकारिता का सबसे मूल कार्य देखें… तो वह क्या है? घटनास्थल पर क्या हो रहा है… उसे बिना छिपाए… बिना तोड़े-मरोड़े… समाज तक पहुंचाना।
महाभारत में यह काम कौन कर रहा था? संजय। कुरुक्षेत्र के युद्ध में धृतराष्ट्र स्वयं उपस्थित नहीं थे। लेकिन उन्हें हर पल की जानकारी मिल रही थी। कौन आगे बढ़ रहा है.. कौन घायल हुआ… कौन विजयी हो रहा है… संजय सब बता रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि धृतराष्ट्र उनके स्वामी थे। लेकिन फिर भी संजय ने कभी सत्ता को खुश करने के लिए सच नहीं छिपाया। उन्होंने यह नहीं कहा कि कौरव जीत रहे हैं जबकि वे हार रहे हों। उन्होंने तथ्यों को वैसे ही प्रस्तुत किया जैसे वे थे। आज के पत्रकार के लिए इससे बड़ी सीख क्या हो सकती है? सत्ता के दरबार में बैठकर भी सत्य बोलना। यही पत्रकारिता का पहला धर्म है।
महाभारत में एक घटना है। द्रोणाचार्य को हराना लगभग असंभव था। तब योजना बनाई गई कि उन्हें बताया जाए कि अश्वत्थामा मारा गया है। वास्तव में अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया था। लेकिन संदेश इस तरह दिया गया कि द्रोणाचार्य भ्रमित हो जाएं। युधिष्ठिर ने कहा— “अश्वत्थामा हतः…” और बहुत धीमे स्वर में जोड़ा— “…नरो वा कुंजरो वा।” यानी मनुष्य या हाथी। द्रोणाचार्य ने केवल पहला हिस्सा सुना। और परिणाम इतिहास है। यह घटना हमें क्या सिखाती है? कि केवल झूठ ही खतरनाक नहीं होता। आधा सच भी उतना ही खतरनाक हो सकता है।
आज के डिजिटल युग में यही चुनौती सबसे बड़ी है। कई बार पूरी खबर नहीं दिखाई जाती। सिर्फ एक वीडियो क्लिप। सिर्फ एक बयान। सिर्फ एक तस्वीर। और फिर पूरा नैरेटिव बदल जाता है। महाभारत हमें सिखाती है कि अधूरी सूचना भी विनाश का कारण बन सकती है। अगर संजय को पहला युद्ध संवाददाता कहा जाए… तो हनुमान को पहला खोजी संवाददाता कहा जा सकता है।
जब सीता माता का पता नहीं था…तब हनुमान लंका पहुंचे। उन्होंने केवल सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने स्वयं जाकर देखा। तथ्यों की पुष्टि की। सीता माता से मिले। प्रमाण के रूप में चूड़ामणि लेकर लौटे। और फिर श्रीराम को जानकारी दी। आज की भाषा में कहें तो… उन्होंने Ground Reporting की… Fact Verification किया… और Evidence Based Reporting की। यानी पत्रकारिता का दूसरा धर्म— पहले सत्यापन… फिर प्रसारण।
भारतीय परंपरा में नारद मुनि को सूचना वाहक माना जाता है। वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक समाचार पहुंचाते थे। लेकिन नारद का एक और पक्ष भी है। वे जानते थे कि सूचना समाज को प्रभावित करती है। एक खबर युद्ध भी करा सकती है… और एक खबर शांति भी ला सकती है।
आज सोशल मीडिया के युग में यह बात पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। एक वायरल पोस्ट… एक फर्जी वीडियो… एक भ्रामक ट्वीट… कई बार समाज में तनाव पैदा कर सकता है। इसलिए पत्रकारिता केवल सूचना नहीं है। यह जिम्मेदारी भी है।
जब अंग्रेजों का शासन था… तब पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं थी। वह एक मिशन थी। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने कलम को हथियार बनाया। उन्होंने प्रताप अखबार के माध्यम से जनजागरण किया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई। जेल गए। संघर्ष किया। और अंततः समाज के लिए अपना बलिदान भी दिया। उनके लिए पत्रकारिता TRP नहीं थी। राष्ट्र निर्माण का माध्यम थी।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम पत्रकारिता की दुनिया से भी जुड़ा रहा। उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे प्रकाशनों में काम किया। पत्रकारिता ने उन्हें शब्दों की ताकत दी। विचारों को जनता तक पहुंचाने की कला दी। और वही कला आगे चलकर उन्हें भारत के सबसे लोकप्रिय वक्ताओं में शामिल करती है। यह पत्रकारिता की शक्ति है। एक लेखक को नेता बना सकती है। एक विचार को आंदोलन बना सकती है।
1826 में एक अखबार छापने में कई दिन लगते थे। आज एक मोबाइल फोन से पूरी दुनिया तक पहुंचा जा सकता है। पहले खबरें डाक से पहुंचती थीं। आज सेकंडों में वायरल हो जाती हैं। यह तकनीकी क्रांति है। लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी आई हैं। फेक न्यूज। डीपफेक वीडियो। AI से बनाई गई नकली तस्वीरें। क्लिकबेट पत्रकारिता। राजनीतिक ध्रुवीकरण। आर्थिक दबाव। और सबसे बड़ा संकट— स्पीड बनाम सत्य।
आज सवाल यह नहीं है कि खबर कितनी जल्दी पहुंची। सवाल यह है कि क्या खबर सही थी? महाभारत के संजय से लेकर रामायण के हनुमान तक… भारतीय परंपरा हमें बताती है कि सूचना केवल खबर नहीं होती। वह समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है। संजय ने सत्य बताया। हनुमान ने सत्य खोजा। नारद ने सूचना के प्रभाव को समझा। और आधुनिक पत्रकारिता का दायित्व भी यही है। सत्य को खोजना। सत्य को परखना। और सत्य को समाज तक पहुंचाना।
पत्रकारिता का असली धर्म सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं है। पत्रकारिता का असली धर्म सत्य के साथ खड़ा होना है। हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक तिथि नहीं है। यह उन पत्रकारों, संपादकों, लेखकों और विचारकों को नमन करने का दिन है… जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी सच को सामने लाने का साहस दिखाया। पंडित जुगल किशोर शुक्ल से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक… गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर धर्मवीर भारती तक… और संजय से लेकर आज के डिजिटल पत्रकार तक… एक सूत्र हमेशा समान रहा है— समाज को सत्य बताना। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल वोट नहीं होती… बल्कि जागरूक नागरिक… और स्वतंत्र, जिम्मेदार एवं सत्यनिष्ठ पत्रकारिता भी होती है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस की सभी पत्रकारों, संपादकों, मीडिया कर्मियों और पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
जय हिंद!
