SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर | मतदाता सूची की सफाई या विपक्ष की हार? 

Rakesh Sharma - National Head
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क्या चुनाव आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) कर सकता है? क्या मतदाताओं से दस्तावेज मांगना उनके नागरिक होने पर शक करना है? और क्या चुनाव आयोग के पास नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच का अधिकार है? इन सभी सवालों का जवाब अब देश की सर्वोच्च अदालत ने दे दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा कराए गए SIR को वैध और संवैधानिक करार देते हुए कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल वोटिंग कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके लिए यह भी जरूरी है कि मतदाता सूची सही, विश्वसनीय और त्रुटिरहित हो।

SIR: दरअसल, यह मामला बिहार में चुनाव आयोग द्वारा पिछले वर्ष शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान से जुड़ा था। इस अभियान को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया सामान्य मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया से अलग है और इससे मतदाताओं को अनावश्यक दस्तावेजी बोझ उठाना पड़ रहा है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची शामिल थे, ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने साफ कहा कि जब कानून खुद चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार देता है, तो केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को गलत नहीं कहा जा सकता कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया जैसी नहीं दिखती। यानी अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग को संविधान और कानून के तहत यह शक्ति प्राप्त है।

SIR: कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 324, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग ने SIR की जरूरत क्यों महसूस की?

SIR: इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा बताए गए कारण पूरी तरह उचित हैं। कोर्ट के अनुसार, देश में चार दशक से अधिक समय से कोई व्यापक गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था। इस दौरान लगातार नए नाम जुड़ते रहे, पुराने नाम हटते रहे, बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हुआ, शहरों का तेजी से विस्तार हुआ और जनसंख्या संरचना में भी बदलाव आए। ऐसे में मतदाता सूची में गड़बड़ियों की संभावना बढ़ना स्वाभाविक है। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि मतदाता सूची में केवल पात्र और वास्तविक मतदाताओं के नाम मौजूद हों।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नागरिकता से जुड़ी बहस को लेकर रहा। विपक्ष और याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया था कि मतदाताओं से दस्तावेज मांगना उनकी नागरिकता पर संदेह करने जैसा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दस्तावेज मांगना नागरिकता पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड की पुष्टि करने की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में दर्ज है, उसके नागरिक होने की धारणा बनी रहती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में कभी कोई सत्यापन ही नहीं किया जा सकता। यानी अदालत ने नागरिकता की मौजूदा स्थिति और सत्यापन प्रक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया।

SIR: हालांकि, कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा भी तय की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच तो कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता। यदि जांच के दौरान आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह होता है या पर्याप्त संतोष नहीं मिलता, तो उस मामले को केंद्र सरकार की सक्षम प्राधिकरण के पास भेजना होगा। अंतिम निर्णय वही प्राधिकरण करेगा।

इसका मतलब है कि चुनाव आयोग की भूमिका केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित रहेगी, जबकि नागरिकता का अंतिम निर्धारण कानून के अनुसार संबंधित सरकारी एजेंसियां करेंगी। फैसले में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कहा है कि वर्ष 2003 की मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए थे, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजा जाए, ताकि उन पर विधिसम्मत निर्णय लिया जा सके।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। एक तरफ चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया के लिए संवैधानिक समर्थन मिल गया है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष द्वारा उठाए गए कई सवालों को अदालत ने स्वीकार नहीं किया। हालांकि, यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि आने वाले समय में SIR की जमीनी प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन और नागरिकता से जुड़े मामलों पर राजनीतिक और कानूनी चर्चाएं जारी रह सकती हैं।

SIR: लेकिन फिलहाल इतना तय है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है और उसे सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को आवश्यक अधिकार प्राप्त हैं। अब बड़ा सवाल यह है… क्या यह फैसला भविष्य में देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियानों को नई गति देगा? क्या इससे चुनावी प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी होगी? या फिर इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और तेज होगा?

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