“एक तरफ अमेरिका का दबाव… दूसरी तरफ 78 साल पुरानी सोच… एक तरफ आर्थिक मजबूरी… दूसरी तरफ धार्मिक राजनीति… और इन दोनों के बीच फंस गया है पाकिस्तान।
डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि पाकिस्तान इजराइल को एक देश के रूप में स्वीकार करे। लेकिन इस्लामाबाद ने बिना एक पल गंवाए साफ शब्दों में कह दिया—’नहीं’। सवाल है… आखिर ऐसा क्या है कि पाकिस्तान अमेरिका को नाराज़ करने का जोखिम उठा सकता है, लेकिन इजराइल को मान्यता देने का नहीं? आज बात करेंगे उस भू-राजनीतिक संघर्ष की… जिसने पाकिस्तान को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हर फैसला नुकसान का सौदा दिखाई देता है।
25 मई की रात डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों को एक संदेश दिया। संदेश साफ था— अगर अमेरिका के साथ बड़े समझौते चाहिए… अगर मध्य पूर्व में नई राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनना है… तो फिर Abraham Accords पर हस्ताक्षर करने होंगे। यानी इजराइल को औपचारिक रूप से मान्यता देनी होगी। लेकिन सबसे पहले और सबसे तेज इंकार पाकिस्तान की तरफ से आया। क्यों? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें 78 साल पीछे जाना होगा। भारत और पाकिस्तान को आजाद हुए कुछ ही महीने हुए थे।
संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव आया। एक हिस्सा यहूदियों के लिए… एक अरबों के लिए। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अरब दुनिया के साथ खड़ा रहेगा। 1948 में जब इजराइल बना… तब पाकिस्तान ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया। और तब से लेकर आज तक पाकिस्तान की आधिकारिक नीति नहीं बदली। 1967 की अरब-इजराइल जंग में पाकिस्तान सिर्फ बयान नहीं दे रहा था। उसने अपने लड़ाकू पायलट अरब देशों की मदद के लिए भेजे। पाकिस्तानी पायलट सैफुल आजम ने इजराइली विमानों को मार गिराया। आज भी पाकिस्तान में इस कहानी को गर्व के साथ सुनाया जाता है। यानी इजराइल विरोध पाकिस्तान की राजनीति का हिस्सा ही नहीं… उसकी राष्ट्रीय पहचान का भी हिस्सा बन चुका है।
दुनिया के ज्यादातर देशों के पासपोर्ट लगभग हर देश के लिए वैध होते हैं। लेकिन पाकिस्तान का पासपोर्ट एक अलग कहानी कहता है। उस पर आज भी लिखा जाता है— “Not Valid For Israel” यानि पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति को सीधे अपने नागरिकों के दस्तावेज़ों पर लिख दिया है।
2005 में पहली बार ऐसा लगा कि शायद पाकिस्तान और इजराइल के रिश्तों में बदलाव आ सकता है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने पर्दे के पीछे बातचीत शुरू की। तुर्किये की मदद से पाकिस्तान और इजराइल के विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई। मुशर्रफ ने इजराइली नेताओं से सार्वजनिक रूप से मुलाकात भी की। लेकिन फिर पाकिस्तान में राजनीतिक भूचाल आ गया। कट्टरपंथी संगठनों ने सड़कों पर विरोध शुरू कर दिया। मुशर्रफ पर फिलिस्तीन और इस्लाम से गद्दारी के आरोप लगे। और अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा। यहीं पाकिस्तान की सबसे बड़ी सच्चाई छिपी है। नेता चाहें भी… तो जनता और धार्मिक संगठन उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे।
समस्या सिर्फ धार्मिक नहीं है। समस्या आर्थिक भी है। पाकिस्तान भारी कर्ज में डूबा हुआ है। IMF से मिला हालिया 7 अरब डॉलर का पैकेज उसका 24वां बेलआउट था। देश की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। और IMF में सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका का है। अगर वॉशिंगटन चाहे… तो पाकिस्तान के लिए अगला आर्थिक पैकेज हासिल करना बेहद मुश्किल हो सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं.. पाकिस्तान की वायुसेना का सबसे अहम हथियार अमेरिकी F-16 विमान हैं। इनकी तकनीकी सहायता और रखरखाव के लिए भी पाकिस्तान अमेरिका पर निर्भर है। यानी पाकिस्तान अमेरिका को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकता। क्योंकि इजराइल को मान्यता देने की कीमत सिर्फ कूटनीतिक नहीं है। यह कीमत घरेलू राजनीति में चुकानी पड़ेगी।
इमरान खान की पार्टी पहले से सरकार पर हमला बोल रही है। कट्टरपंथी संगठन लगातार सक्रिय हैं। और फिलिस्तीन का मुद्दा पाकिस्तान में बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में इजराइल को मान्यता देना किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा कदम हो सकता है। फिलहाल पाकिस्तान ने साफ इंकार कर दिया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। डोनाल्ड ट्रम्प पहले ही संकेत दे चुके हैं कि अगर कुछ देश Abraham Accords का हिस्सा नहीं बनते… तो बड़े क्षेत्रीय समझौतों पर असर पड़ सकता है।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है— क्या ट्रम्प पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाएंगे? या फिर पाकिस्तान को एक विशेष छूट मिलेगी? लेकिन एक बात तय है… इस वक्त पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर रास्ता जोखिम से भरा हुआ है। एक तरफ अमेरिका है। दूसरी तरफ अपनी 78 साल पुरानी नीति। एक तरफ आर्थिक जरूरतें हैं। दूसरी तरफ घरेलू राजनीति और धार्मिक दबाव। और शायद यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए इजराइल का सवाल सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं… बल्कि उसकी पहचान, उसकी राजनीति और उसके भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
